महत्त्वपूर्ण दिवस , जून 2020


महत्त्वपूर्ण दिवस


जून 2020


1 जून

  • विश्व दुग्ध दिवस
  • अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस
  • वास्तुकला दिवस
  • दादा भाई नौरोजी स्मृति दिवस
  • विश्व माता-पिता  दिवस
3 जून
  • विश्व साइकिल दिवस
4 जून
  • बाल यातना एवं अवैध तस्करी के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस
5 जून
  • विश्व पर्यावरण दिवस (यूएनईपी)
  • गुरु गोलवलकर स्मृति दिवस
7 जून

  • विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस
8 जून
  • विश्व महासागर दिवस
  • विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस
9 जून
  • बिरसा मुण्डा शहीद दिवस (झारखण्ड)
  • अन्तर्राष्ट्रीय अभिलेख दिवस
10 जून
  • दृष्टिदान संकल्प दिवस
12 जून
  • विश्व बालश्रम निषेध दिवस
14 जून
  • विश्व रक्तदान दिवस
16 जून
  • अंतर्राष्ट्रीय एकता दिवस
  • परिवार के प्रेषण का अंतर्राष्ट्रीय दिवस (IDFR)
17 जून
  • विश्‍व रेगिस्‍तान तथा सूखा रोकथाम दिवस
18 जून
  • अंतर्राष्ट्रीय पिकनिक दिवस
  • महारानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस
  • गोवा क्रान्ति दिवस
19 जून
  • विश्व एथनिक दिवस
  • संघर्ष में यौन हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस
20 जून
  • विश्व शरणार्थी (रिफ्यूजी) दिवस
21 जून
  • विश्व संगीत दिवस
  • अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
23 जून
  • अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक संघ का स्थापना दिवस
  • रथ यात्रा, संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा दिवस
  • डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्मृति दिवस
  • अंतराष्ट्रीय विधवा दिवस
24 जून
  • वीरांगना रानी दुर्गावती बलिदान दिवस
26 जून
  • अंतर्राष्ट्रीय मादक द्रव्य निषेध (नशा मुक्ति/निवारण) दिवस
  • अंतर्राष्‍ट्रीय देह व्‍यापार विरोधी दिवस
  • अत्याचार के पीड़ितों के समर्थन में संयुक्‍त राष्‍ट्र अंतर्राष्ट्रीय दिवस
29 जून
  • सांख्यिकी दिवस (प्रोफेसर प्रशांत चंद्र जन्मदिन
30 जून
  • हूल क्रान्ति दिवस


फोटोशॉप / Photoshop

Photoshop Introduction (फोटोशॉप परिचय)



यह Adobe कम्‍पनी द्वारा बनाया गया है,  Photoshop नाम आते ही कई प्रकार के अनोखे चिञ दिमाग में आने लगते हैं, और यह सही भी है फोटोशॉप दुनिया में Digital Imaging हेतु प्रयोग किया जाने वाला सबसे Popular Softwere है, फोटोशॉप से कई Incredible तस्‍वीरें बनायी जा सकती है, और बनायी भी जा रही है, जिनके कुछ उदाहरण आप यहॉ देख सकते हैं, अगर आपके अन्‍दर एक कलाकार छिपा है तो Photoshop आपके लिये अनन्‍त संभावनाओं की दुनिया है,  दुनियाभर में Photoshop के द्वारा बहुत से लोग Business भी कर रहे है, और जिससे उनकी अच्‍छी खासी कमाई भी हो रही हैं। अगर आप एक Professional फोटोग्राफर हैं, और आपका हाथ फोटोशॉप में साफ हो जाता है तो आपके लिये रोजगार के कई अवसर हो सकते हैं या आप घर बैठे अपना Business शुरू कर सकते हैं।

Features of Adobe Photoshop (फोटोशॉप की विशेषतायें)
Photoshop ने Digital Imaging की दुनिया में अब तक का सबसे Popular जगह से ऐसे ही नहीं बनाई है, बल्कि आज तक अन्‍य कोई सॉफ्टवेयर इसकी जगह नहीं ले पाया है, इसका भी एक कारण है, इसका Simple Navigation, इसका टूलबार व इसके अन्‍य Plugin जो Photoshop को अन्‍य Imaging Software से अलग बनाते हैं। यह आपको काम करने की Freedom देता है, इसके Command Shortcuts आपको Speed  प्रदान करते हैं, इसके Tools आपके काम को Professional Touch देते हैं, अगर आपमें जरा भी हुनर है, और आप Photoshop को दिल से सीखना चाहते हैं, तो आप अपने लिये घर बैठे कमाई का जरिया बना सकते हैं। लेकिन मेहनत हो आपको ही करनी होगी। 

फोटोशॉप एक Graphics और Imaging Software है, इसलिये इसको Computer में चलाने के लिये कुछ System Requirements भी होते हैं, यानी फोटोशॉप को ठीक से चलाने के लिये आपके कम्‍प्‍यूटर में कम से इन हार्डवेयर को होना आवश्‍यक हैा फोटोशॉप Windows xp, Windows 7 पर अच्‍छा काम करता है, लेकिन आप अगर Windows xp से लोअर वर्जन प्रयोग कर रहे हैं, तो फोटोशाप चलाने में परेशानी हो सकती हैा इसके लिये कम से इन्‍टेल P4 2.8 गीगाहटर्ज वाला प्रोसेसर होना आवश्‍यक है तथा आपके कम्‍प्‍यूटर में 512 रैम अवश्‍य होनी चाहिये, वरना आपका कम्‍प्‍यूटर हैंग भी हो सकता हैा  एक और बात अगर आप एक Professional Work करना चाहते है तों कम से कम 256 MB का एक ग्राफिक्‍स कार्ड अवश्‍य लगा लें।

फोटोशॉप में फोटो की बैकग्राउन्‍ड कैसे बदलें
how to change photo background in photoshop

Photoshop के बारे में हम पहले भी बता चुकें कि यह word का सबसे Popular Software है, काफी लोग my big guide help के माध्‍यम से पूछते है कि photoshop में किसी Photo की Background कैसे change जाती है, -

सबसे पहले उस Photo को Photoshop में Open कर लीजिये, जिसकी background आपको बदलनी है। मान लीजिये हमने Salman Khan का wallpaper लिया है जिसकी background बदलनी है। photo



open होने के बाद आप अपने toolbar से pen tool को Select कीजिये या Keyboard से P बटन को दबाईये, ऐसा करते ही आपके Mouse के Cursor के स्‍थान पर Pen Tool आ जायेगा, अब बडी ही सावधानी से उस photo को select करते जाइये,और जिस point से select करना start किया उसी  point पर अपना सलैक्‍शन समाप्‍त कीजिये, यह बात ध्‍यान में रखिये कि select करते समय photo और background का हिस्‍सा अलग-अलग होना चाहिये। 


Pen Tool से photo को select करने के बाद उस पर Right click कीजिये और Make Selection को चुनिये, Make Selection को चुनने पर Feather Radius आप्‍शन में 1 या 2 भरकर OK कर दीजिये। असल में यह आपके द्वारा की गयी कटिंग को Soft कर देता है, जितने अंक आप यहॉ बढाते जायेगें आपकी द्वारा दिये गये Cut background में उतने ही mix हो जायेगें। OK करने पर एक dotted line आपके Photo के चारों ओर आ जायेगी। अब Keyboard से Ctrl+c दबाईये और Photo के इस कटे हुए भाग को copy कर लीजिये। अब computer से कोई भी Background or scenery open कीजिये और open कीजिये scenery पर केवल Ctrl+V यानी पेस्‍ट कर दीजिये।

पेस्‍ट होने के बाद सलैक्‍श्‍ान टूल से Photo को कहीं भी उठाकर रख लीजिये, अब Photo को JPEG फारमेट में सेव कर लीजिये।

फोटोशॉप में पासपोर्ट फ़ोटो बनाने का तरीका
इस टॉपिक में आप आज यह सीखेंगे की आप फोटोशॉप का उपयोग कर पासपोर्ट साइज फोटो कैसे बना सकते है । पासपोर्ट साइज फोटो का इस्तेमाल हर जगह होता है सभी सरकारी डाक्यूमेंट्स तथा आवेदनों में पासपोर्ट साइज फोटो ही उपयोग में लेना होता है ।


अब शुरुआत करते है फोटोशॉप की पासपोर्ट फ़ोटो बनाने के लिए अपने फोटोशॉप को ओपन करे
अब चित्र के अनुसार ऊपर टूलबार में File पर क्लिक करके Open पर क्लिक करे और वो फ़ोटो खोले जिसकी आपको पासपोर्ट साइज़ कि फ़ोटो बनानी है



फ़ोटो ओपन होने के बाद आपको क्रॉप टूल को सलेक्ट करना है क्रॉप का इस्तेमाल फ़ोटो को सलेक्ट किये हुए भाग को काटना होता है इस टूल का इस्तेमाल हम फ़ोटो का साइज़ सलेक्ट करने में भी करते है
क्रॉप टूल सलेक्ट करने के बाद आपको चित्र के अनुसार ऊपर बार में Width में 1.4 Height में 1.7 और Resolution में 300 लिख कर एंटर का बटन दबा देना है

अब इस टूल से फ़ोटो को सलेक्ट करे सलेक्ट करते ही आपका फ़ोटो उसी साइज़ में कट जाएगा जो साइज़ आपने ऊपर बॉक्स में लिखा है

फ़ोटो का साइज़ बनाने के बाद ऊपर टूलबार में File पर क्लिक करके New पर क्लिक करे

क्लिक करते ही आपने सामने एक विंडो खुल जायेगी जिसमे आपको चित्र के अनुसार
Width 6 inches 
Height 4 inches 
Resolution 300 inches
Color Mode RGB Color
Background White
सलेक्ट करना है सलेक्ट करके ओके कर दे ओके करते ही आपकी एक न्यू फ़ाइल बन जायेगी जिसका साइज़ 4x6 inches होगा

अब आपको मूव टूल सलेक्ट करना है इस टूल को सलेक्ट करने के बाद ऊपर Auto-Select वाले बॉक्स पर याद से सलेक्ट कर दे अगर आप Auto-Select वाले बॉक्स पर राईट का निशान नहीं लगाएंगे तो आपका मूव टूल काम नहीं करेगा
अब आप मूव टूल से फ़ोटो को माउस से पकड़ कर उस फ़ाइल में डाले जो आपने 4x6 साइज़ की बनायी है जैसा आप ऊपर चित्र में देख रहे है

नयी फ़ाइल में फ़ोटो आने के बाद आप फ़ोटो पर क्लिक करे और कीबोर्ड से Alt का बटन दबा कर फ़ोटो की एक और लेयर या कॉपी बना ले किसी फ़ोटो की 2 या कितनी भी लेयर बनाने के लिए हम Alt बटन के साथ फ़ोटो को ड्रेग करके न्यू लेयर बना सकते है या फिर Ctrl J का बटन दबा कर भी न्यू लेयर बना सकते है
नयी लेयर बनाने के बाद आपके सामने लेयर बॉक्स में Layer 1 और Layer 1 Copy के नाम से आपको 2 लेयर दिखायी देगी जैसा आप ऊपर चित्र में देख रहे है

अब आप Layer 1 Copy पर क्लिक करके कीबोर्ड से Ctrl E का बटन दबाये ऐसा करते ही आपकी दोनों लेयर जुड़ जायेगी जैसा आप ऊपर चित्र में देख रहे है

अब आप फ़ोटो पर क्लिक करके और कीबोर्ड से Alt का बटन दबा कर फ़ोटो की 3 लेयर या कॉपी बना ले जैसे आपको ऊपर चित्र में दिखायी दे रहा है

अब आप Layer 1 Copy 3 पर क्लिक करके कीबोर्ड से Ctrl E का बटन 3 बार दबाये ऐसा करते ही आपकी चारो लेयर जुड़ जायेगी जैसा आप ऊपर चित्र में देख रहे है
अब आपके सामे एक ही लेयर होगी अब आप माउस से फ़ोटो को सलेक्ट करके बनी हुई फ़ोटो को बिच सेंटर में सेट कर सकते है जैसा ऊपर चित्र में दिखायी दे रहा है



अब आपकी फ़ोटो बनकर तैयार है अब इसे कीबोर्ड से Ctrl S का बटन दबा कर सेव करे Ctrl S का बटन दबा कर जो आपके सामने विंडो खुलेगी उसमे आपको JPEG फ़ाइल को सलेक्ट करके फ़ोटो को सेव करना है क्युकी लेब की प्रिंटिंग मशीन से JPEG फॉर्मेट में बनी हुई फ़ोटो ही प्रिंट होती है

Photoshop All keyboard shortcut key
फोटोशॉप की लोकप्रियता का एक कारण इसकी स्पीड है, इसमें आप काफी तेजी से काम कर सकते है । दुनियाभर में लाखों प्रोफेशनल फोटोशॉप उपयोग में लेते है लेकिन माउस का उपयोग फोटोशॉप में काफी काम लोग ही करते है क्योंकि इसके अनेक महत्वपूर्ण एडिटिंग ऑप्शन सिर्फ एक बटन दबने से एक्टिवेट हो जाते है । की-बोर्ड से उपयोग से आप अपनी स्पीड को कई गुना तेज कर सकते है

फोटोशॉप की-बोर्ड शार्टकट

New File Ctrl+N
Open File Ctrl+O
Browse Shift+Ctrl+O
Open as Alt+Ctrl+O
Edit in ImageRedy Shift+Ctrl+M
Close Ctrl+W
Close All Alt+Ctrl+W
Save Ctrl+S
Sace As... Shift+Ctrl+S
Sace for Web Alt+Shift+ctrl+S
Revert F12
File Info.. Alt+Ctrl+L
Page Setup Shift+Ctrl+P
Print With Preview Alt+Ctrl+P
Print.. Ctrl+P
Print one Copy Alt+Shift+Ctrl+P
Exit Ctrl+Q

दृष्टिदान संकल्प दिवस / Eye Donation Day

दृष्टिदान संकल्प दिवस


नेत्रदान के महत्व को देखते हुए हर साल 10 जून को विश्व नेत्रदान दिवस (Eye Donation Day) मनाया जाता हैं। इस दिन नेत्रदान करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता हैं। नेत्रदान करना महादान करने जैसा होता हैं। लोग धन, अन्न, विद्या, श्रम, रक्तदान, आदि का दान तो करते ही हैं लेकिन लोगों को मरने से पहले नेत्रदान करने का भी संकल्प लेना चाहिए। ताकि जो व्यक्ति नेत्रहिन हैं उन्हें एक नई रोशनी मिल सकें।

विश्व नेत्रदान का उद्देश्य
जीवन में आँखों का क्या महत्व होता हैं। इसके महत्व को व्यापक पैमाने पर समझाने और जनता को जागरूक करने के लिए विश्व Eye Donation Day मनाया जाता हैं और लोगों के मरने के बाद अपनी आखें दान करने की शपथ लेने के लिए प्रेरित करना भी इसका उद्देश्य हैं। जो व्यक्ति नेत्रहीन हैं या किसी कारणवश उनकी आखों की रोशनी चली गई हैं। वो किसी तरह इस खूबसूरत दुनिया को देख सकें। इसलिए लोगों को मरनें से पहले आखें दान करने के लिए जागरूक किया जाता हैं।

आँखों की संरचना
आँख जीव जंतुओं और मानव के शरीर का आवश्यक अंग होता हैं। आँख या नेत्र जीवधारियों का वह अंग है जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील है। हमारे नेत्र का काला गोल हिस्सा 'कार्निया' कहलाता है। यह आँख का एक पर्दा है जो बाहरी वस्तुओं का चित्र बनाकर हमें दृष्टि प्राप्त करता है। दृष्टि एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें प्रकाश किरणों के प्रति संवेदिता, स्वरूप, दूरी, रंग आदि सभी का प्रत्यक्ष ज्ञान समाहित है। आँखें अत्यंत जटिल ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, जो दायीं-बायीं दोनों ओर एक-एक नेत्र कोटरीय गुहा में स्थित रहती है। ये लगभग गोलाकार होती हैं और इनका व्यास लगभग एक इंच (2.5 सेंटीमीटर) होता है।

आँखों का हमारें जीवन में महत्व
आँखों और दृष्टि का हमारें जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। यदि व्यक्ति के जीवन में दृष्टि न हो तो उसके जीने का कोई मतलब ही नहीं होता और उसे प्रत्येक कार्य के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे तो सभी आंखों के महत्व को समझते हैं और इसीलिए इसकी सुरक्षा भी सभी बड़े पैमाने पर करते हैं। हममें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दूसरों के बारे में भी सोचते हैं। आंखें ना सिर्फ हमें रोशनी दे सकती हैं बल्कि हमारे मरने के बाद वह किसी और की जिंदगी में उजाला भी भर सकती हैं।

लेकिन कुछ लोग अंधविश्वास के कारण Eye Donation नहीं करते। उनका मानना हैं कि अगले जन्म में वे नेत्रहीन ना पैदा हो जाएं। इस अंधविश्वास की वजह से दुनियां के कई नेत्रहीन लोगों को जिंदगी भर अंधेरे में ही रहना पड़ता है। सभी लोगों को इस बात को समझना होगा और नेत्रदान अवश्य करना चाहिए। हमारा एक सही फैसला लोगों के जिंदगी में उजाला ला सकता हैं।

आँखों की देखभाल करने के उपाय

  • आँखों को सुरक्षित रखने में आंवले का इस्तेमाल करना बेहद फायदेमंद हैं।
  • नियमित रूप से नेत्रचिकित्सक से आँखों की जांच करवातें रहें।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • अधिक से अधिक पानी पीयें और खूब सारी गाजर के साथ हरी सब्जियां खाएं।
  • चमकीले प्रकाश में सीधे कभी न देखें।
  • आँखें या चेहरा पोंछने के लिए कभी किसी और का रुमाल या तौलिया इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • ज़रूरत होने पर गॉगल्स अवश्य पहनें और हमेशा पर्याप्त नींद लें।
  • कंप्यूटर, टेबलेट, और फोन की स्क्रीन पर देखने के समय को सीमित करें।
  • आँखों के स्वास्थ्य को सही रखने में योगदान देने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
  • आँखों के लिए खाद्य पदार्थों में मछली सबसे लाभकारी है। मछली के सेवन से आँखों की रोशनी तेज होती है।
  • बादाम या जैतून के तेल से आँखों के आस पास हल्के हल्के हाथों से मसाज करें, क्योंकि इससे रक्त संचार ठीक रहता है और आँखों की थकान भी कम होती है।

बिरसा मुंडा / Birsa Munda

बिरसा मुंडा


बिरसा मुंडा (  Birsa Munda , जन्म- 15 नवम्बर , 1875 ई . , राँची , झारखण्ड ; मृत्यु -9 जून , 1900 ई . , राँची जेल ) एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे । ये मुंडा जाति से सम्बन्धित थे । वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब ' बिरसा भगवान ' कहकर याद करते हैं । मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था । 19 वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे ।
जन्म तथा शिक्षा बिरसा मुंडा का जन्म 1875 ई . में झारखण्ड राज्य के राँची में हुआ था । उनके पिता , चाचा , ताऊ सभी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था । बिरसा के पिता ' सुगना मुंडा ' जर्मन धर्म प्रचारकों के सहयोगी थे। बिरसा का बचपन अपने घर में , ननिहाल में और मौसी की ससुराल में बकरियों को चराते हुए बीता । बाद में उन्होंने कुछ दिन तक ' चाईबासा ' के जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण की । परन्तु स्कूलों में उनकी आदिवासी संस्कृति का जो उपहास किया जाता था , वह बिरसा को सहन नहीं हुआ । इस पर उन्होंने भी पादरियों का और उनके धर्म का भी मजाक उड़ाना शुरू कर दिया । फिर क्या था । ईसाई धर्म प्रचारकों ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया । लोगों का विश्वास इसके बाद बिरसा के जीवन में एक नया मोड़ आया । उनका स्वामी आनन्द पाण्डे से सम्पर्क हो गया और उन्हें हिन्दू धर्म तथा महाभारत के पात्रों का परिचय मिला । यह कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी आलौकिक घटनाएँ घटीं , जिनके कारण लोग बिरसा को भगवान का अवतार मानने लगे । लोगों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि बिरसा के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं ।
प्रभाव में वृद्धि जन - सामान्य का बिरसा में काफ़ी दृढ़ विश्वास हो चुका था , इससे बिरसा को अपने प्रभाव में वृद्धि करने में मदद मिली । लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे । बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया । लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी । उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे , वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे ।

विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस / World Brain Tumor Day

विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस


विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस ( World Brain Tumor Day) प्रतिवर्ष '8 जून' को मनाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का यह मानना है कि विश्व भर में हर दिन एक लाख में से दस लोग ब्रेन ट्यूमर के कारण मरते हैं। 'ब्रेन ट्यूमर दिवस' पर विश्व के अनेक देशों में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिनमें इस बीमारी के लक्षणों और इसके उपचार के बारे में आवश्यक जानकारियाँ दी जाती हैं। ब्रेन ट्यूमर सबसे घातक बीमारियों में गिनी जाती है।

ब्रेन ट्यूमर क्या है?
'मस्तिष्क कैन्सर' यानी 'ब्रेन ट्यूमर' एक खतरनाक रोग है। समय रहते इसका उचित इलाज नहीं कराया गया तो यह जानलेवा साबित होता है। जब मानव शरीर में कोशिकाओं की अनावश्यक वृद्धि हो, लेकिन शरीर को इन अनावश्यक वृद्धि वाली कोशिकाओं की आवश्यकता न हो, तब इस अवस्था को ही कैंसर के नाम से जाना जाता है। ब्रेन के किसी हिस्से में पैदा होने वाली असामान्य कोशिकाओं की वृद्धि ब्रेन ट्यूमर के रूप में प्रकट होती है।

शुरुआत
'विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस' वर्ष 2000 से प्रतिवर्ष 8 जून को मनाया जाता है। इस दिवस को सबसे पहले जर्मन ब्रेन ट्यूमर एसोसिएशन (डॉयचे हिरनट्यूमरहिल्फ़) द्वारा मनाया गया था। यह ब्रेन ट्यूमर के बारे में लोगों के बीच शिक्षा और जन-जागरूकता प्रसारित करने वाला एक गैर लाभकारी संगठन है। जर्मनी में घातक ब्रेन ट्यूमर सामान्यत: पाया जाता है। इस बीमारी से अकेले जर्मनी में आठ हज़ार से अधिक लोग पीड़ित हैं। विश्व भर में प्रतिदिन ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने वाले पांच सौ से अधिक नए मामलों की जानकारी प्राप्त होती है। अधिकांश ट्यूमर से पीड़ित होने वाले रोगियों की संख्या ट्यूमर की तुलना में ब्रेन मेटास्टेसिस के कारण अधिक होती है। यह बच्चों में कैंसर का सबसे सामान्य प्रकार होता है।[1]

भारत में ब्रेन ट्यूमर
भारत में ब्रेन ट्यूमर की व्यापकता और प्रसार बढ़ता जा रहा है। बचपन में होने वाले कैंसर के अध्ययन के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर लड़कियों में सामान्यत: पाया जाता है। यहाँ तक कि यह वयस्क स्त्री और पुरुष दोनों लिंगों में भी पाया जाता है। हालांकि स्थितियों के बीच कुछ भिन्नता हो सकती है। भारत सरकार ने ब्रेन ट्यूमर की रोकथाम, स्क्रीनिंग, रोग का जल्दी पता लगाने, निदान और अंतिम चरण में उपशामक देखभाल उपचार प्रदान करने के लिए अनेक उद्देश्यों की पूर्ति के साथ 'राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम' शुरुआत की है।

1. ब्रेन ट्यूमर के बारे में कुछ तथ्य
2. ब्रेन ट्यूमर किसी भी उम्र में हो सकता है।
3. ब्रेन ट्यूमर होने के सही कारण स्पष्ट नहीं है।
4. ब्रेन ट्यूमर के लक्षण उनके आकार, प्रकार और स्थान पर निर्भर करते हैं।

वयस्कों के बीच प्राथमिक ब्रेन ट्यूमर का सबसे सामान्य प्रकार एस्ट्रोसाइटोमा, मस्तिष्कावरणार्बुद और ओलिगोडेन्ड्रोग्लियोमा हैं।
बच्चों में पाए जाने वाले ब्रेन ट्यूमर का सबसे सामान्य प्रकार मेडुलोब्लास्टोमा, ग्रेड एक या ग्रेड दो एस्ट्रोसाइटोमा, (या तंत्रिकाबंधार्बुद) एपिन्डाइमोमा और ब्रेन स्टेम ग्लियोमा हैं।
ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने वाले ज़ोखिम के कारकों में पारिवारिक इतिहास एवं अधिक से अधिक संख्या में एक्सरे कराना हो सकते हैं।
चिकित्सक द्वारा ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने का निर्धारण, चिकित्सीय इतिहास, शारीरिक परीक्षण तथा ब्रेन एवं तंत्रिका तंत्र के विभिन्न महत्वपूर्ण परीक्षणों के आधार पर किया जाता हैं।
ब्रेन ट्यूमर के वैकल्पित उपचारों में शल्य चिकित्सा, विकिरण चिकित्सा और कीमोथेरेपी या उपचारों का समन्वय शामिल हैं।

ब्रेन ट्यूमर के लक्षण
ब्रेन ट्यूमर के लक्षण ब्रेन के हिस्से में होने वाले बदलाव के आधार पर पैदा होते हैं। कुछ सामान्य लक्षणों में सिरदर्द, दौरा, दृष्टि समस्या, उल्टी और मानसिक परिवर्तन जैसे लक्षण हो सकते हैं। रोगी सुबह सिरदर्द और उल्टी महसूस कर सकता है। अत्यधिक विशिष्ट समस्याएँ जैसे कि चलने, बोलने और इन्द्रियबोध में परेशानी हो सकती हैं।

उपचार
चिकित्सक ब्रेन ट्यूमर के प्रकार, ग्रेड और ट्यूमर की स्थिति तथा रोगी के सामान्य स्वास्थ्य के आधार पर उपचार की सलाह दे सकता है-


  • सर्जरी/शल्य-चिकित्सा
  • रेडियोथेरेपी
  • कीमोथेरपी
  • स्टेरॉयड
  • एंटी-सीज़र दवाएं
  • वेंट्रिकुलर पेरिटोनियल शन्ट

विश्व महासागर दिवस / World Oceans Day

विश्व महासागर दिवस


विश्व महासागर दिवस (World Oceans Day) प्रतिवर्ष '8 जून' को मनाया जाता है। समुद्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए इस दिवस की शुरुआत वर्ष 1992 में की गई थी। सन 1992 में रियो डी जनेरियो में हुए 'पृथ्वी ग्रह' नामक फोरम में प्रतिवर्ष विश्व महासागर दिवस मनाने के फैसले के बाद और सन 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इस संबंध में आधि‍कारिक मान्यता दिए जाने के बाद से यह दिवस मनाया जाने लगा है। विश्व महासागर दिवस मनाने का प्रमुख कारण विश्व में महासागरों के महत्व और उनकी वजह से आने वाली चुनौतियों के बारे में विश्व में जागरूकता पैदा करना है। इसके अलावा महासागर से जुड़े पहलुओं, जैसे- खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता, पारिस्थितिक संतुलन, सामुद्रिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग, जलवायु परिवर्तन आदि पर प्रकाश डालना है।

शुरुआत
पहला विश्व महासागर दिवस 8 जून, 2009 को मनाया गया था। इसके बाद से प्रतिवर्ष 8 जून को विश्व भर में 'विश्व महासागर दिवस' मनाया जाता है। यह दिवस सन 1992 में 'रियो डी जनेरियो' में हुए "पृथ्वी ग्रह" नामक फोरम में प्रतिवर्ष विश्व महासागर दिवस मनाने के फैसले के बाद और वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इस सम्बंध में आधिकारिक मान्यता दिये जाने के बाद मनाया जाने लगा।

महासागर हमारी पृथ्वी पर न सिर्फ जीवन का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण संतुलन में भी प्रमुख भूमिका अदा करता है। पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों से माना जाता है। महासागरीय जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था। आज महासागर असीम जैव विविधता का भंडार है। हमारी पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भाग महासागरों से घिरा है। महासागरों में पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का लगभग 97 प्रतिशत जल समाया हुआ है। महासागरों की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि पृथ्वी के सभी महासागरों को एक विशाल महासागर मान लिया जाए तो उसकी तुलना में पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक छोटे द्वीप से प्रतीत होंगे। मुख्यत: पृथ्वी पर पाँच महासागर हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-

1. प्रशांत महासागर
2. हिन्द महासागर
3. अटलांटिक महासागर
4. उत्तरी ध्रुव महासागर
5. दक्षिणी ध्रुव महासागर

महासागरों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्त्व मानव के लिए इन्हें अतिमहत्त्वपूर्ण बनाता है। इसलिए महासागरों के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से सन 1992 से प्रतिवर्ष 8 जून को "विश्व महासागर दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

उद्देश्य
'विश्व महासागर दिवस' मनाने का प्रमुख कारण विश्व में महासागरों के महत्त्व और उनकी वजह से आने वाली चुनौतियों के बारे में विश्व में जागरूकता पैदा करना है। इसके अलावा महासागर से जुड़े पहलुओं, जैसे -खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता, पारिस्थितिक संतुलन, सामुद्रिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग, जलवायु परिवर्तन आदि पर प्रकाश डालना है। हर साल 'विश्व महासागर दिवस' पर पूरे विश्व में महासागर से जुड़े विषयों में विभिन्न प्रकार के आयोजन किए जाते हैं, जो महासागर के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं के प्रति जागरूकता पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

जैव विविधता
अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं। पृथ्वी के विशाल क्षेत्र में फैले अथाह जल का भंडार होने के साथ महासागर अपने अंदर व आस-पास अनेक छोटे-छोटे नाजुक पारितंत्रो को पनाह देते हैं, जिससे उन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के जीव व वनस्पतियाँ पनपती हैं। समुद्र में प्रवाल भित्ति क्षेत्र ऐसे ही एक पारितंत्र का उदाहरण है जो असीम जैव विविधता का प्रतीक है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में स्थित मैन्ग्रोव जैसी वनस्पतियों से संपन्न वन समुद्र के अनेक जीवों के लिए नर्सरी का काम करते हुए विभिन्न जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं। अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं। महासागरों में पृथ्वी का सबसे विशालकाय जीव व्हेल से लेकर सूक्ष्म जीव भी मिलते हैं। एक अनुमान के अनुसार केवल महासागर के अंदर करीब दस लाख प्रजातियां उपस्थित हो सकती हैं। जैव विविधता से संपन्न होने के साथ ही महासागर धरती के मौसम को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक हैं। समुद्री जल की लवणता और विशिष्ट ऊष्माधारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है। यह तो हम जानते ही हैं कि पृथ्वी की समस्त ऊष्मा में जल की ऊष्मा का विशेष महत्त्व है। जितनी ऊष्मा एक ग्राम जल के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि करेगी, उससे एक ग्राम लोहे का तापमान दस डिग्री बढ़ाया जा सकता है। अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्री जल दिन में सूर्य की ऊर्जा का बहुत बड़ा भाग अपने में समा लेता है। इस प्रकार अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्र ऊष्मा का भण्डारक बन जाता है, जिसके कारण विश्व भर में मौसम संतुलित बना रहता है या यूं कहें कि जीवन के लिए औसत तापमान बना रहता है।

मौसम के संतुलन में समुद्री जल की लवणता जीवन के लिए एक वरदान है। पृथ्वी पर जलवायु के बदलने की घटना और समुद्री जल का खारापन आपस में अन्तःसंबंधित हैं। यह तो हम जानते ही हैं कि ठंडा जल, गर्म जल की तुलना में अधिक घनत्व वाला होता है। समुद्र में किसी स्थान पर सूर्य के ताप के कारण जल के वाष्पित होने से उस क्षेत्र के जल के तापमान में परिवर्तन होने के साथ वहां के समुद्री जल की लवणता और आसपास के क्षेत्र की लवणता में अंतर उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण गर्म जल की धाराएं ठंडे क्षेत्रों की ओर चल देती हैं और ठंडा जल उष्ण और कम उष्ण प्रदेशों में आता है। समुद्र में ये धाराएं केवल इस कारण उत्पन्न होती हैं कि समुद्र का जल खारा है। क्योंकि यदि सारे समुद्रों का जल मीठा होता तो लवणता का क्रम कभी न बनता और जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाली धाराएं सक्रिय न होती। परिणामस्वरूप ठंडे प्रदेश बहुत ठंडे रहते और गर्म प्रदेश बहुत गर्म। तब पृथ्वी पर जीवन के इतने रंग न बिखरे होते क्योंकि पृथ्वी की असीम जैव-विविधता का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां अनेक प्रकार की जलवायु मौजूद है और जलवायु के निर्धारण में महासागरों का महत्त्वपूर्ण योगदान नकारा नहीं जा सकता है।

जीवों के पर्यावास पर प्रभाव
महासागर के पानी का तापमान और ऑक्सीजन का घटता स्तर समुद्री जानवरों को भूमध्य रेखा से दूर रखने में एक साथ मिलकर भूमिका निभाते हैं, जहां ऑक्सीजन की आपूर्ति उनकी भावी ज़रूरतें पूरी कर सकती है। यह जानकारी एक नए शोध में सामने आई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पानी का तापमान ऑक्सीजन के लिए जानवरों के मेटाबॉलिक ज़रूरतों की तीव्रता को बढ़ाता है। ऐसा व्यायाम के दौरान भी होता है, लेकिन गर्म पानी में उनके शरीर को शक्ति देने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा कम रहती है। ऊंचाई पर भी ऐसा ही होता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से लगभग दो-तिहाई श्वास संबंधी तनाव गर्म तापमान की वजह से होता है, जबकि बाकी इसलिए होता है, क्योंकि गर्म पानी में गैसें कम घुली हुई होती हैं।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर और इस शोध के प्रमुख कर्टिस ड्यूच के मुताबिक, "यदि आपके मेटाबॉलिज्म बढ़ते हैं तो ऐसी स्थिति में आपको अधिक भोजन और ऑक्सीजन की ज़रूरत है।” “इसका मतलब यह है कि भविष्य में गर्म पानी की वजह से जल में रहने वाले जीवधारी ऑक्सीजन की कमी से मर जाएंगे। सभी जानते हैं कि समुद्र में ऑक्सीजन का स्तर घट रहा है और यह जलवायु परिवर्तन के साथ अधिक घटेगा।” यह शोध चार अटलांटिक महासागर प्रजातियों पर किया गया। अटलांटिक कॉड जो गहरे समुद्र में रहता है, अटलांटिक रॉक क्रैब जो तटीय पानी में रहता है, शार्प स्नाउट सीब्रीम जो उपोष्णकटिबंधीय अटलांटिक और भूमध्य सागर में रहता है और समुद्र तल में रहने वाली मछली ईलपाउट पर किया गया। यह शोध ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

मानवीय गतिविधियों का असर
वर्तमान में मानवीय गतिविधियों का प्रभाव समुद्रों पर भी दिखाई देने लगा है। महासागरों के तटीय क्षेत्रों में दिनों-दिन प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। जहां तटीय क्षेत्र विशेष कर नदियों के मुहानों पर सूर्य के प्रकाश की पर्याप्तता के कारण अधिक जैव-विविधता वाले क्षेत्रों के रूप में पहचाने जाते थे, वहीं अब इन क्षेत्रों के समुद्री जल में भारी मात्रा में प्रदूषणकारी तत्वों के मिलने से वहाँ जीवन संकट में हैं। तेलवाहक जहाजों से तेल के रिसाव के कारण एवं समुद्री जल के मटमैला होने पर उसमें सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वहाँ जीवन को पनपने में परेशानी होती है और उन स्थानों पर जैव-विविधता भी प्रभावित होती है। यदि किसी कारणवश पृथ्वी का तापमान बढ़ता है तो महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता में कमी आएगी, जिससे वायुमंडल में गैसों की आनुपातिक मात्रा में परिवर्तन होगा और तब जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों में असंतुलन होने से पृथ्वी पर जीवन संकट में पड़ सकता है। समुद्रों से तेल व खनिज के अनियंत्रित व अव्यवस्थित खनन एवं अन्य औद्योगिक कार्यों से समुद्री परितंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पर्यावरण सरंक्षण के लिए प्रतिबद्ध संस्था अंतर-सरकारी पैनल की रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों से ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री जल स्तर में वृद्धि हो रही है और जिसके परिणामस्वरूप विश्व भर के मौसम में बदलाव हो सकते हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस (यूएनईपी)

विश्व पर्यावरण दिवस


विश्व पर्यावरण दिवस पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण हेतु पूरे विश्व में मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने हेतु वर्ष 1972 में की थी। इसे 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद शुरू किया गया था। 5 जून 1974 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया।

इतिहास
1972 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मानव पर्यावरण विषय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा का आयोजन किया गया था। इसी चर्चा के दौरान विश्व पर्यावरण दिवस का सुझाव भी दिया गया और इसके दो साल बाद, 5 जून 1974 से इसे मनाना भी शुरू कर दिया गया। 1987 में इसके केंद्र को बदलते रहने का सुझाव सामने आया और उसके बाद से ही इसके आयोजन के लिए अलग अलग देशों को चुना जाता है।

इसमें हर साल 143 से अधिक देश हिस्सा लेते हैं और इसमें कई सरकारी, सामाजिक और व्यावसायिक लोग पर्यावरण की सुरक्षा, समस्या आदि विषय पर बात करते हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने के लिए कवि अभय कुमार ने धरती पर एक गान लिखा था, जिसे 2013 में नई दिल्ली में पर्यावरण दिवस के दिन भारतीय सांस्कृतिक परिषद में आयोजित एक समारोह में भारत के तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों, कपिल सिब्बल और शशि थरूर ने इस गाने को पेश किया।


आयोजन


बाल यातना एवं अवैध तस्करी के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस

बाल यातना एवं अवैध तस्करी के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस


बाल यातना एवं अवैध तस्करी के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस 04 जून को संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता है. इसकी स्थापना 19 अगस्त 1982 को हुई थी,

मूल रूप से 1982 के लेबनान युद्ध के पीड़ितों पर केंद्रित इस दिवस का उद्देश्य "विश्व भर में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण का शिकार बच्चों द्वारा पीड़ित और दर्द को समझना है. यह दिवस बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है |

दादा भाई नौरोजी

दादा भाई नौरोजी


दादा भाई नौरोजी को 'भारतीय राजनीति का पितामह' कहा जाता है। वह दिग्गज राजनेता, उद्योगपति, शिक्षाविद और विचारक भी थे। श्री दादाभाई नौरोजी का शैक्षिक पक्ष अत्यन्त उज्ज्वल रहा। 1845 में एल्फिन्स्टन कॉलेज में गणित के प्राध्यापक हुए। यहाँ के एक अंग्रेज़ी प्राध्यापक ने इन्हें 'भारत की आशा' की संज्ञा दी। अनेक संगठनों का निर्माण दादाभाई ने किया। 1851 में गुजराती भाषा में 'रस्त गफ्तार' साप्ताहिक निकालना प्रारम्भ किया। 1867 में 'ईस्ट इंडिया एसोसियेशन' बनाई। अन्यत्र लन्दन के विश्वविद्यालय में गुजराती के प्रोफेसर बने। 1869 में भारत वापस आए। यहाँ पर उनका 30,000 रु की थैली व सम्मान-पत्र से स्वागत हुआ। 1885 में 'बम्बई विधान परिषद' के सदस्य बने। 1886 में 'होलबार्न क्षेत्र' से पार्लियामेंट के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन असफल रहे। 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए। 'पावर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया' पुस्तक लिखी, जो अपने समय की महती कृति थी। 1886 व 1906 ई. में वह 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' के अध्यक्ष बनाए गए।

जीवन परिचय
दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को मुम्बई के एक ग़रीब पारसी परिवार में हुआ। जब दादाभाई 4 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। उनकी माँ ने निर्धनता में भी बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई। उच्च शिक्षा प्राप्त करके दादाभाई लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में पढ़ाने लगे थे। लंदन में उनके घर पर वहां पढ़ने वाले भारतीय छात्र आते-जाते रहते थे। उनमें गांधी जी भी एक थे। मात्र 25 बरस की उम्र में एलफिनस्टोन इंस्टीट्यूट में लीडिंग प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय बने।

राजनीति में
नौरोजी वर्ष 1892 में हुए ब्रिटेन के आम चुनावों में 'लिबरल पार्टी' के टिकट पर 'फिन्सबरी सेंट्रल' से जीतकर भारतीय मूल के पहले 'ब्रितानी सांसद' बने थे। नौरोजी ने भारत में कांग्रेस की राजनीति का आधार तैयार किया था। उन्होंने कांग्रेस के पूर्ववर्ती संगठन 'ईस्ट इंडिया एसोसिएशन' के गठन में मदद की थी। बाद में वर्ष 1886 में वह कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। उस वक्त उन्होंने कांग्रेस की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। नौरोजी गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी के सलाहकार भी थे। उन्होंने वर्ष 1855 तक बम्बई में गणित और दर्शन के प्रोफेसर के रूप में काम किया। बाद में वह 'कामा एण्ड कम्पनी' में साझेदार बनने के लिये लंदन गए। वर्ष 1859 में उन्होंने 'नौरोजी एण्ड कम्पनी' के नाम से कपास का व्यापार शुरू किया। कांग्रेस के गठन से पहले वह सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा स्थापित 'इंडियन नेशनल एसोसिएशन' के सदस्य भी रहे। यह संगठन बाद में कांग्रेस में विलीन हो गया।उन्होंने 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'कलकत्ता अधिवेशन' की अध्यक्षता की। उनकी महान् कृति पॉवर्टी ऐंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया 'राष्ट्रीय आंदोलन की बाइबिल' कही जाती है। वे महात्मा गांधी के प्रेरणा स्त्रोत थे। वे पहले भारतीय थे जिन्हें एलफिंस्टन कॉलेज में बतौर प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली। बाद में यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में उन्होंने प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाए दीं। उन्होंने शिक्षा के विकास, सामाजिक उत्थान और परोपकार के लिए बहुत-सी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया, और वे प्रसिद्ध साप्ताहिक 'रास्ट गोफ्तर' के संपादक भी रहे। वे अन्य कई जर्नल से भी जुडे़ रहे। वे सामाजिक कार्यों में भी रुचि लेते थे। उनका कहना था कि, ‘हम समाज की सहायता से आगे बढ़ते हैं, इसीलिए हमें भी पूरे मन से समाज की सेवा करनी चाहिए।

योगदान
दादाभाई नौरोजी ने 'ज्ञान प्रसारक मण्डली' नामक एक महिला हाई स्कूल एवं 1852 में 'बम्बई एसोसिएशन' की स्थापना की। लन्दन में रहते हुए दादाभाई ने 1866 ई. मे 'लन्दन इण्डियन एसोसिएशन' एवं 'ईस्ट इंडिया एसोसिएशन' की स्थापना की। वे राजनीतिक विचारों से काफ़ी उदार थे। ब्रिटिश शासन को वे भारतीयों के लिए दैवी वरदान मानते थे। 1906 ई. में उनकी अध्यक्षता में प्रथम बार कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज्य की मांग की गयी। दादाभाई ने कहा "हम दया की भीख नहीं मांगते। हम केवल न्याय चाहते हैं। ब्रिटिश नागरिक के समान अधिकारों का ज़िक्र नहीं करते, हम स्वशासन चाहते है।" अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारतीय जनता के तीन मौलिक अधिकारों का वर्णन किया है। ये अधिकार थे-

लोक सेवाओं में भारतीय जनता की अधिक नियुक्ति।
विधानसभाओं में भारतीयों का अधिक प्रतिनिधित्व।
भारत एवं इंग्लैण्ड में उचित आर्थिक सबन्ध की स्थापना।

विदेश में
बंबई में एक पहचान क़ायम करने के बाद वे इंग्लैण्ड गए और वहाँ 'भारतीय अर्थशास्त्र और राजनीति' के पुनरुद्धार के लिए आवाज़ बुलंद की और हाउस ऑफ कॉमंस के लिए चुने गए। 'भारतीय राजनीति के पितामह’ कहे जाने वाले प्रख्यात राजनेता, उघोगपति, शिक्षाविद और विचारक दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति बुद्धिजीवी वर्ग के सम्मोहन के बीच उसकी स्याह सचाई को सामने रखने के साथ ही कांग्रेस के लिये राजनीतिक ज़मीन भी तैयार की थी। उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति बुद्धिजीवी वर्ग के सम्मोहन को खत्म करने का प्रयास किया। दादाभाई नौरोजी को भारतीय राजनीति का 'ग्रैंड ओल्डमैन' कहा जाता है। वे पहले भारतीय थे जिन्हें 'एलफिंस्टन कॉलेज' में बतौर प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली। बाद में 'यूनिवर्सिटी कॉलेज', लंदन में उन्होंने प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाए दीं। उन्होंने शिक्षा के विकास, सामाजिक उत्थान और परोपकार के लिए बहुत-सी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया, और वे प्रसिद्ध 'साप्ताहिक रास्ट गोफ्तर' के संपादक भी रहे। वे अन्य कई जर्नल से भी जुडे़ रहे। बंबई में एक पहचान क़ायम करने के बाद वे इंग्लैण्ड गए और व 'भारतीय अर्थशास्त्र और राजनीतिक पुनरुद्धार' के लिए आवाज़ बुलंद की और 'हाउस ऑफ कॉमंस' के लिए चुने गए।

नेताओं के आदर्श
1866 में लंदन में 'ईस्ट इंडिया एसोशिएशन' की स्थापना करके ब्रिटिश शासन का सर्वप्रथम आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले दादाभाई नौरोजी का नाम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में अग्रगण्य है। 1885 से 1907 के बीच कांग्रेस में नरमपंथी या उदारवादी नेताओं का बोलबाला था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, दादाभाई नौरोजी, मदनमोहन मालवीय, गोपालकृष्ण गोखले, केटी तैलंग, फिरोजशाह मेहता आदि शांतिपूर्ण ढंग से मांगें मनवाने के लिए प्रयासरत थे। अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाना इन सभी नेताओं का एकमात्र लक्ष्य था। दादाभाई ने यह मांग उठाई कि इंग्लैंड की पार्लियामेंट में कम से कम एक भारतीय के लिए भी सीट सुनिश्चित होनी चाहिए। उनकी प्रखर प्रतिभा से प्रभावित और अकाट्य तर्को से पराजित होकर अंग्रेजों ने उनकी यह मांग मान ली। उन्हे ही इंग्लैंड की पार्लियामेंट में भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया। अंग्रेजों की पार्लियामेंट में खड़े होकर उनके विरोध में बोलना दादाभाई जैसे व्यक्ति के लिए ही संभव था। उन्होंने बड़ी सूझबूझ से अपने इस दायित्व का निर्वहन किया। देश की स्वतंत्रता के लिए दादाभाई नौरोजी के मार्गदर्शन और उनके सक्रिय योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
देश और समाज की सेवा के लिए समर्पित दादाभाई नौरोजी नरमपंथी नेताओं के तो आदर्श थे ही, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जैसे गरमपंथी नेता भी उन्हे प्रेरणास्त्रोत मानते थे। तिलक ने दादाभाई के साथ रहकर वकालत का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। एक बार दादाभाई को किसी मुकदमे के संबंध में इंग्लैंड जाना पड़ा, उनके साथ सहायक के रूप में तिलक जी भी गए। दादाभाई मितव्ययिता की दृष्टि से लंदन में न ठहरकर वहां से दूर एक उपनगर में ठहरे। सवेरे जल्दी उठने की उनकी आदत थी। घर का सारा काम वे स्वयं करते थे। एक दिन जब वे घर का काम कर रहे थे तभी तिलक जी की आंख खुल गई। उन्होंने कहा क्या आज नौकर नहीं आया, जो सब काम आपको करना पड़ रहा है? इस पर दादाभाई ने तिलक जी को समझाते हुए कहा, मैं अपना काम स्वयं करता हूं। अपने किसी कार्य के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहता। सुनकर तिलक जी अभिभूत हो गए।

स्वदेश प्रेम
दादाभाई का स्वदेश प्रेम उन्हें भारत ले आया। उस समय यहां अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। ब्रिटिश सरकार ने अपनी छवि यह बना रखी थी कि वह भारत को तरक़्क़ी के रास्ते पर ले जा रही है, लेकिन दादाभाई नौरोजी ने तथ्यों और आंकड़ों से सिद्ध किया कि अंग्रेजी राज में भारत का बहुत आर्थिक नुकसान हो रहा है। भारत दिन-पर-दिन निर्धन होता जा रहा है। उनकी बातों से लोगों को यह विश्वास हो गया कि भारत को अब स्वतंत्र हो जाना चाहिए। वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने कहा कि भारत भारतवासियों का है। उनकी बातों से तिलक, गोखले और गांधीजी जैसे नेता भी प्रभावित हुए। द ग्रैंड ओल्डमैन आफ इंडिया के नाम से मशहूर दादा भाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में चुने जाने वाले पहले एशियाई थे। संसद सदस्य रहते हुए उन्होंने ब्रिटेन में भारत के विरोध को प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत की लूट के संबंध में ब्रिटिश संसद में थ्योरी पेश की। इस ड्रेन थ्योरी में भारत से लूटे हुए धन को ब्रिटेन ले जाने का उल्लेख था। कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले प्रो. एसआर मेहरोत्रा ने बताया कि नौरोजी अपनी वाक् कला से लोगों को अचंभित करते थे। वह जब ब्रिटिश संसद के लिए सदस्य चुने गए तो उन्होंने संसद में कहा, ‘कि मैं धर्म और जाति से परे एक भारतीय हूं’। वह कहा करते थे कि जब एक शब्द से काम चल जाए तो दो शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। एक लिबरल के रूप में वह 1892 में हाउस आफ कामंस के लिए चुने गये। वे एक कुशल उद्यमी थे। 1939 में पहली बार नौरोजी की जीवनी लिखने वाले आरपी मसानी ने ज़िक्र किया है कि नौरोजी के बारे में 70 हज़ार से अधिक दस्तावेज थे जिनका संग्रह ठीक ढंग से नहीं किया गया।
मेहरोत्रा के मुताबिक वेडबर्न डब्ल्यू सी बनर्जी और एओ ह्यूम की तरह दादा भाई नौरोजी के बिना कांग्रेस का इतिहास अधूरा है। उन्होंने जो पत्र लिखे हैं उनका संग्रह और संरक्षण किया जाना ज़रूरी है। वे 30 जून 1917 को दुनिया को अलविदा कह गए। नौरोजी गोपाल कृष्ण और महात्मा गांधी के गुरु थे। नौरोजी सबसे पहले इस बात को दुनिया के सामने लाए कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार भारतीय धन को अपने यहां ले जा रही है। उन्होंने ग़रीबी और ब्रिटिशों के राज के बिना भारत नामक किताब लिखी। वह 1892 से 1895 तक ब्रिटिश संसद के सदस्य रहे। एओ ह्यूम और दिनशा एडुलजी वाचा के साथ मिलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय उन्हें जाता है। मनेकबाई और नौरोजी पालनजी डोर्डी के पुत्र दादा भाई नौरोजी का जन्म एक ग़रीब पारसी परिवार में चार सितंबर 1825 को गुजरात के नवसारी में हुआ। वे शुरुआत से काफ़ी मेधावी थे। वर्ष 1850 में केवल 25 वर्ष की उम्र में प्रतिष्ठित एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए। इतनी कम उम्र में इतना सम्मानजनक ओहदा संभालने वाले वह पहले भारतीय थे।

भारतीय धन की निकासी
1868 ई. में सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने ही अंग्रेज़ों द्वारा भारत के 'धन की निकासी' की ओर सभी भारतीयों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने 2 मई, 1867 ई. को लंदन में आयोजित 'ईस्ट इंडिया एसोसिएशन' की बैठक में अपने पत्र, जिसका शीर्षक 'England Debut To India' को पढ़ते हुए पहली बार धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा- "भारत का धन ही भारत से बाहर जाता है, और फिर धन भारत को पुनः ऋण के रूप में दिया जाता है, जिसके लिए उसे और धन ब्याज के रूप से चुकाना पड़ता है। यह सब एक दुश्चक्र था, जिसे तोड़ना कठिन था।" उन्होंने अपनी पुस्तक 'Poority And Unbritish Rules In India' में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय का अनुमान 20 रुपये लगाया था। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य पुस्तकें, जिसमें उन्होंने धन के निष्कासन सिद्धान्त की व्याख्या की है, 'द वान्ट्स एण्ड मीन्स ऑफ़ इण्डिया (1870 ई.)', 'आन दि कामर्स ऑफ़ इण्डिया (1871 ई.)' आदि हैं। दादाभाई नौरोजी 'धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त' के सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रखर प्रतिपादक थे। 1905 ई. में उन्होंने कहा था कि "धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण।" दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को 'अनिष्टों का अनिष्ट' की संज्ञा दी है।
महादेव गोविन्द रानाडे ने कहा है, "राष्ट्रीय पूँजी का एक तिहाई हिस्सा किसी न किसी रूप में ब्रिटिश शासन द्वारा भारत से बाहर ले जाया जाता है।"

बड़ौदा के प्रधानमंत्री
लार्ड सैलसिबरी ने उन्हें ब्लैक मैन कहा था। हालांकि वह बहुत गोरे थे। उन्होंने संसद में बाइबिल से शपथ लेने से इंकार कर दिया था। अंग्रेज़ों की कारस्तानियों को बयान करने के लिए उन्होंने एक पत्र रस्त गोतार शुरू किया जिसे सच बातों को कहने वाला पत्र कहा जाता था। वर्ष 1874 में वह बड़ौदा के प्रधानमंत्री बने और तब वे तत्कालीन बंबई के लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य चुने गये। उन्होंने मुंबई में इंडियन नेशनल एसोसिएशन की स्थापना की जिसका बाद में कांग्रेस में विलय कर दिया गया।

देशभक्त
दादाभाई कितने प्रखर देशभक्त थे, इसका परिचय 1906 ई. की कोलकाता कांग्रेस में मिला। यहाँ उन्होंने पहली बार स्वराज शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने कहा, हम कोई कृपा की भीख नहीं माँग रहे हैं। हमें तो न्याय चाहिए।

निधन
दादाभाई बीच-बीच में इंग्लैण्ड जाते रहे, परन्तु स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण वे प्राय: स्वदेश में रहे और 92 वर्ष की उम्र में 30 जून, 1917 को मुम्बई भारत में ही उनका देहान्त हुआ। वे भारत में राष्ट्रीय भावनाओं के जनक थे। उन्होंने देश में स्वराज की नींव डाली।

वास्तुकला दिवस

वास्तुकला दिवस

वास्तुकला किसी स्थान को मानव के लिए वासयोग्य बनाने की कला है। अत: यह कला कालांतर में चाहे जितनी भी जटिल हो गई हो, लेकिन इसका आरंभ मौसम की उग्रता, वन्य पशुओं के भय और शत्रुओं के आक्रमण से बचने के प्रारंभिक उपायों में ही हुआ होगा। मानव सभ्यता के इतिहास का भी कुछ ऐसा ही आरंभ है। इसीलिए विद्वानों ने इसे मानव सभ्यता का 'योजक मसाला' कहा है। आठवीं शताब्दी के बाद और विशेषकर दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच का काल मन्दिर निर्माण कला का चरमोत्कर्ष माना जा सकता है। आज हम जिन भव्यों मन्दिरों को देखते हैं, उनमें से अधिकतर उसी काल में बनाये गए थे। इस काल की मन्दिर निर्माण कला की मुख्य शैली 'नागर' नाम से जानी जाती है। यद्यपि इस शैली के मन्दिर सारे भारत में पाए जाते हैं तथापि इनके मुख्य केन्द्र उत्तर भारत और दक्कन में थे।

आदिकालीन वास्तु
आदिकाल में शिकारियों और मछुओं ने पहाड़ी गुफाओं में शरण ली होगी। ये गुफाएँ ही शायद मानव निवास के प्राचीनतम रूप रहे होंगे। किसान वृक्षों के झुरमुटों में रहते और सरकंड़े, घास आदि के झोंपड़े बनाते रहे होंगे। अपने पशुओं के साथ घूमने वाले चरवाहे चमड़े के खोलों में रहते रहे होंगे और उन्हें बांसों या लट्ठों से ऊँचा करके डेरे बनाते रहे होंगे। इन्हीं गुफाओं और डेरों में बाद के वास्तुविकास के बीज मिलते हैं। मिस्र के पुराने मकानों के नमूने साक्षी हैं कि अनगढ़ द्वारों चट्टानी दीवारों और छतों वाली प्राकृतिक गुफाओं से ही पत्थर की दीवारें उठाने और उन पर पटियों की छत रखने का विचार उत्पन्न हुआ। झुरमुटों के अनुरूप झोंपड़े बने, जिनकी दीवारें परस्पर सटाकर गाड़ी हुई शाखाओं से और छत घास से बनाई गई। इस प्रकार के एकमंजिले और दुमंजिले झोंपड़े अब भी आदिवासी बनाते हैं। चमड़े के डेरे भी अरब के बद्दू और अन्य घुमंतू जातियाँ काम में लाती हैं। प्रागैतिहासिक अवशेष, जिनका वास्तुकीय की अपेक्षा पुरातात्विक महत्व ही अधिक है, प्राय: एकाश्मक, स्तूप तथा स्विट्जरलैंड, इटली या आयरलैंड में मिले सरोवरनिवासों के रूप में हैं। बाद में धीरे-धीरे इनका विकास होता गया।

प्राच्य और पाश्चात्य वास्तु
विकसित वास्तु को दो स्थूल वर्गों में बाँटा जा सकता है: एक तो प्राच्य, जैसे- भारतीय, चीनी और जापानी वास्तु, जो प्राय: स्वतंत्र शैलियाँ हैं और जिनका वास्तुविकास में विशेष प्रभाव नहीं पड़ा; और दूसरा पाश्चात्य वास्तु, जिसका आरंभ मिस्र और सीरिया में हुआ और चरम विकास यूरोप में हुआ। प्राचीन अमरीकी और इस्लामी वास्तु भी स्वतंत्र शैलियाँ हैं। यद्यपि इस्लामी वास्तु का अमिट प्रभाव स्पेन तक पड़ा। मिस्र और पश्चिमी एशिया का प्रभाव यूनान पर और फलत: सारी पाश्चात्य शैलियों पर पड़ा, इसलिए वे पाश्चात्य वास्तु के अंतर्गत ही आ सकते हैं।

प्राचीन कला में अनेक ऐसी बातें हैं जिनके अभ्यस्त यूरोपीय लोग नहीं हैं, इसलिए वे उन्हें अप्रिय और विरूप लगती हैं। किंतु प्रयोग ही धीरे-धीरे प्रकृति बन जाता है। इसलिए पूर्वी और पश्चिमी वास्तु में अनिवार्यत: कुछ भेद है, जो विशुद्ध प्राच्य वास्तु में विशिष्ट धार्मिक कृत्यों और सामाजिक प्रथाओं के प्रभाव के रूप में उद्व्यक्त होता है। पूर्व में अलंकरण योजनाएँ ही प्रमुख रही हैं जबकि यूरोप में निर्माण संबंधी समस्याओं का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए उनके क्रमिक समाधान द्वारा वास्तु विकसित हुआ।

वास्तुकला के ऐतिहासिक विकास के प्रत्येक प्रमुख चरण के मूल में कोई न कोई विचारधारा स्पष्ट झलकती है। यूनानी वास्तु में परिष्कृत पूर्णता थी, रोमन इमारतें अपने वैज्ञानिक निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं, फ्रांसीसी गॉथि वास्तु उग्र क्रियाशीलता का द्योतक है, इतालवी पुनरुद्धार में उस युग का पांडित्य झलकता है और भारतीय वास्तु का प्रमुख गुण है उसका आध्यात्मिक विषय। इसमें संदेह नहीं, कि जनता की तत्कालीन धार्मिक चेतना मूर्त रूप में व्यक्त करना ही भारतीय वास्तु का मूल उद्देश्य रहा है, अर्थात्‌ जनभावना ही ईंट पत्थर में मूर्त हुई है।

पत्थर निर्मित वास्तुकला
अशोक के शासनकाल में दक्षिण एशिया की सबसे विशिष्ट और अतिमहत्त्वपूर्ण पत्थर निर्मित वास्तुकला परंपरा भी देखने को मिलती है। बिहार में गया के निकट बाराबार और नागार्जुनी पहाड़ियों में पत्थर निर्मित वास्तुकला की अनेक श्रंखलाएं परिलक्षित हैं। उनमें अभिचित्रित अनेक अभिलेखों से यह पता चलता है कि वे कुछ आजीवक सन्न्यासियों, संभवत: जैन धर्म के अनुयायियों को निवास हेतु दी गई थीं। पुरातात्विक दृष्टिकोण से वे भारत में पत्थर निर्मित वास्तुकला शैली का एक प्रारंभिक उदाहरण हैं। तत्कालीन युग में बनने वाले लकड़ी और घासफूस के ढांचों का वे प्रतीक हैं। सुदामा और लोभास ऋषि गुफाएं दो प्रसिद्ध ऋषि आश्रम थे। उन गुफाओं में प्रवेश द्वार के साथ-साथ वृत्ताकर कमरे, गोलाकार छत और गोलीय कोठरियाँ बनीं होती थीं।

भारतीय वास्तु
भारतीय वास्तु की विशेषता यहाँ की दीवारों के उत्कृष्ट और प्रचुर अलंकरण में है। भित्तिचित्रों और मूर्तियों की योजना, जिसमें अलंकरण के अतिरिक्त अपने विषय के गंभीर भाव भी व्यक्त होते हैं, भवन को बाहर से कभी कभी पूर्णतया लपेट लेती है। इनमें वास्तु का जीवन से संबंध क्या, वास्तव में आध्यात्मिक जीवन ही अंकित है। न्यूनाधिक उभार में उत्कीर्ण अपने अलौकिक कृत्यों में लगे हुए देश भर के देवी देवता तथा युगों पुराना पौराणिक गाथाएँ, मूर्तिकला को प्रतीक बनाकर दर्शकों के सम्मुख अत्यंत रोचक कथाओं और मनोहर चित्रों की एक पुस्तक सी खोल देती हैं। किंतु इस व्यापक विशेषता के साथ यह भी एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि भारत की प्राचीनतम कला, जैसी दो तीन हज़ार वर्ष ई.पू. विकसित सिंधु घाटी सभ्यता की खोज से प्रकाश में आई है, सौंदर्य की दृष्टि से ऐसी ही शून्य थी, जैसी आज कल की कोई भी सभ्यता जागरण की अँगड़ाई भी न ले पाई थी, भारत की यह कला इतनी विकसित थी, इन बस्तियों के निर्माताओं का नगर नियोजन संबंधी ज्ञान इतना परिपक्व था, उनके द्वारा प्रयुक्त सामग्री ऐसी उत्कृष्ट कोटि की थी और रचना इतनी सुदृढ़ थी कि उस सभ्यता का आरंभ बहुत पहले, लगभग चार पाँच हज़ार वर्ष, ईसा पूर्व, मानने को बाध्य हो पड़ता है। हड़प्पा और मोहन जोदड़ो की खुदाइयों से प्राप्त अवशेष तत्कालीन भौतिक समृद्धि के सूचक हैं और उनमें किसी मंदिर, देवालय आदि के अभाव से यह अनुमान होता है कि वहाँ धार्मिक विचारों का कुछ विशेष स्थान न था, अथवा यदि था तो वह निराकार था।

मुग़ल काल
मुग़लों ने भव्य महलों, क़िलों, द्वारों, मस्जिदों, बावलियों आदि का निर्माण किया। उन्होंने बहते पानी तथा फ़व्वारों से सुसज्जित कई बाग़ लगवाये। वास्तव में महलों तथा अन्य विलास-भवनों में बहते पानी का उपयोग मुग़ल की विशेषता थी। बाबर स्वयं बाग़ों का बहुत शौकीन था और उसने आगरा तथा लाहौर के नज़दीक कई बाग़ भी लगवाए। जैसे काश्मीर का निशात बाग़, लाहौर का शालीमार बाग़ तथा पंजाब तराई में पिंजोर बाग़, आज भी देखे जा सकते हैं। शेरशाह ने वास्तुकला को नयी दिशा दी। सासाराम (बिहार) में उसका प्रसिद्ध मक़बरा तथा दिल्ली के पुराने क़िले में उसकी मस्जिद वास्तुकला के आश्चर्यजनक नमूने हैं। ये मुग़ल-पूर्वकाल के वास्तुकला के चर्मोंत्कर्ष तथा नई शैली के पाररंम्भिक नमूने हैं। अकबर पहला मुग़ल सम्राट था जिसके पास बड़े पैमान पर निर्माण करवाने के लिए समय और साधन थे। उसने कई क़िलों का निर्माण …

 मंदिरों की वास्तुकला
इसकी प्रमुख विशेषता 'प्रतिमा-कक्ष' (जिसे गर्भगृह कहा जाता है) के ऊपर की छत थी, जो गोल और बड़ी होती थी। यद्यपि इसके हर तरफ़ प्रक्षेप हो सकते थे। 'प्रतिमा कक्ष' से लगा एक और कमरा होता था जिसे 'मंडप' कहते थे और कभी-कभी मन्दिर के चारों ओर बड़ी-बड़ी दीवारें होती थीं जिनमें बड़े-बड़े फाटक थे। इस शैली के प्रमुख उदाहरण मध्य प्रदेश में खजुराहो तथा उड़ीसा में भुवनेश्वर के मन्दिर हैं। विश्वनाथ मन्दिर तथा खजुराहो का कन्दारिया महादेव का मन्दिर इस शैली के उत्कृष्ट और सुन्दरतम उदाहरण हैं। इन मन्दिरों पर बारीक खुदाइयों से पता चलता है कि इस काल में मूर्ति कला अपने शिखर पर थी। इनमें से अधिकतर मन्दिरों का निर्माण चंदेलों ने किया था जो इस क्षेत्र में नवीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर तेरहवीं शताब्दी के अन्त तक राज्य करते रहे।

भव्य मन्दिरों का निर्माण
उड़ीसा में इस काल के मन्दिर निर्माण का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण कोणार्क का सूर्य मन्दिर (13 वीं शताब्दी) तथा लिंगराज मन्दिर (11 वीं शताब्दी में निर्मित) हैं। पुरी का प्रसिद्ध जगन्नाथ मन्दिर भी इसी काल की देन है।

उत्तर भारत के और स्थानों में मथुरा, वाराणसी, दिलवाड़ा (आबू) आदि में भी बड़ी संख्या में मन्दिरों का निर्माण हुआ। दक्षिण भारत की तरह यहाँ भी मन्दिर और अधिक होते गए। ये सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केन्द्र भी थे। इनमें से सोमनाथ मन्दिर जैसे कुछ मन्दिरों ने अपार सम्पत्ति इकट्ठी कर ली। ये कई गाँव पर शासन करने लगे। उन्होंने व्यापार में भी भाग लिया।

मुस्लिम वास्तु
वास्तुकला पर मुसलमानों के आक्रमण का जितना प्रभाव भारत में पड़ा उतना अन्यत्र कहीं नहीं, क्योंकि जिस सभ्यता से मुस्लिम सभ्यता की टक्कर हुई, किसी से उसका इतना विरोध नहीं था जितना भारतीय सभ्यता से। चिर प्रतिष्ठित भारतीय सामाजिक और धार्मिक प्रवृत्तियों की तुलना में मुस्लिम सभ्यता बिलकुल नई तो थी ही, उसके मौलिक सिद्धात भी भिन्न थे। दोनों का संघर्ष यथार्थवाद का आदर्शवाद से, वास्तविकता का स्वप्नदर्शिता से और व्यक्त का अव्यक्त से संघर्ष था, जिसका प्रमाण मस्जिद और मंदिर के भेद में स्पष्ट है। मस्जिदें खुली हुई होती हैं, उनका केंद्र सुदूर मक्का की दिशा में होता है; जबकि मंदिर रहस्य का घर होता है, जिसका केंद्र अनेक दीवारों एवं गलियारों से घिरा हुआ बीच का देवस्थान या गर्भगृह होता है। मजिस्द की दीवारें प्राय: सादी या पवित्र आयतों से उत्कीर्ण होती हैं, उनमें मानव आकृतियों का चित्रण निषिद्ध होता है; जबकि मंदिरों की दीवारों में मूर्तिकला और मानवकृति चित्रण उच्चतम शिखर पर पहुँचा, पर लिखाई का नाम न था। पत्थरों के सहल रंगों में ही इस चित्रण द्वारा मंदिरों की सजीवता आई; जबकि मस्जिदों में रंगबिरंगे पत्थरों, संगमर्मर और चित्र विचित्र पलस्तर के द्वारा दीवारें मुखर की गई।

गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर एक ही प्रकार की भारी भरकम संरचनाएँ खड़ी करने में सिद्धहस्त, भारतीय कारीगरों की युगों युगों से एक ही लीक पर पड़ी, निष्प्रवाह प्रतिभा, विजेताओं द्वारा अन्य देशों से लाए हुए नए सिद्धांत, नई पद्धतियाँ और नई दिशा पाकर स्फूर्त हो उठी। फलस्वरूप धार्मिक इमारतों, जैसे मस्जिदों, मक़बरों, रौजों और दरगाहों के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की धर्मनिरपेक्ष इमारतें भी, जैसे महल, मंडप, नगरद्वार, कूप, उद्यान, और बड़े बड़े किले, यहाँ तक कि सारा शहर घेरने वाले परकोटे तक तैयार हुए। देश में उत्तर से दक्षिण तक जैसे जैसे मुस्लिम प्रभत्व बढ़ता गया, वास्तुकला का युग भी बदलता गया। मुस्लिम वास्तु के तीन क्रमिक चरण स्पष्ट हैं। पहला चरण, जो बहुत थोड़े समय रहा, विजयदर्प और धर्मांधता से प्रेरित 'निर्मूलन' का था, जिसके बारे में हसन निज़ामी लिखता है कि प्रत्येक किला जीतने के बाद उसके स्तंभ और नीव तक महाकाय हाथियों के पैरों तले रौंदवाकर धूल में मिला देने का रिवाज था। अनेक दुर्ग, नगर और मंदिर इसी प्रकार अस्तित्वहीन किए गए। तदनंतर दूसरा चरण सोद्देश्य और आंशिक विध्वंस का आया, जिसमें इमारतें इसलिए तोड़ी गई कि विजेताओं की मस्जिदों और मकबरों के लिए तैयार माल उपलब्ध हो सके। बड़ी-बड़ी धरने और स्तंभ अपने स्थान से हटाकर नई जगह ले जाने के लिए भी हाथियों का ही प्रयोग हुआ। प्राय: इसी काल में मंदिरों को विशेष क्षति पहुँची, जो विजित प्रांतों की नयी नयी राजधानियों के निर्माण के लिए तैयार माल की खान बन गए और उत्तर भारत से हिंदू वास्तु की प्राय: सफाई ही हो गई। अंतिम चरण तब आरंभ हुआ, जब आक्रांता अनेक भागों में भली भाँति जग गए थे और उन्होंने प्रत्यवस्थापन के बजाय योजनाबद्ध निर्माण द्वारा सुविन्यस्त और उत्कृष्ट वास्तुकृतियाँ वस्तुत कीं।

शैलियों की दृष्टि से भी मुस्लिम वास्तु के तीन वर्ग हो सकते हैं-
पहला दिल्ली, अथवा शहंशाही है, जिसे प्राय: 'पठान वास्तु' (1193-1554) कहते हैं। (यद्यपि इसके सभी पोषक 'पठान' नहीं थे) इस वर्ग में दिल्ली की कुतुबमीनार (1200), सुल्तान गढ़ी (1231), अल्तमश का मक़बरा (1236), अलाई दरवाज़ा (1305), निजामुद्दीन (1320), गयासुद्दीन तुगलक (1325) और फीरोजशाह तुगलक (1388) के मक़बरे, कोटला फीरोजशाह (1354-1490), मुबारकशाह का मक़बरा (1434), मेरठ की मस्जिद (1505), शेरशाह की मस्जिद (1540-45) सहसराम का शेरशाह का मक़बरा (1540-45), और अजमेर का अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (1205) आदि उल्लेखनीय हैं।
दूसरे वर्ग में प्रांतीय शैलियाँ हैं। इनमें पंजाब शैली (1150-1325 ई.); जैसे मुल्तान के श्रकने आलम (1320) और शाहयूसुफ गर्दिजी (1150), तब्रिजी (1276), बहाउलहक (1262) के मकबरे; बंगाल शैली (1203-1573): जैसे पंडुआ की अदीना मस्जिद (1364), गौर के फतेहखाँ का मक़बरा (1657), क़दम रसूल (1530), तांतीमारा मस्जिद (1475); गुजरात शैली (1300-1572) : जैसे खंबे (1325), अहमदाबाद (1423), भड़ोच और चमाने (1523) की जामा मस्जिदें, नगीना मस्जिद मक़बरा (1525); जौनपुर शैली (1376-1479 : जैसे अटाला मस्जिद (1408), लाल दरवाज़ा मस्जिद (1450), जामा मस्जिद (1470); मालवा शैली (1405-1569) : जैसे माडू के जहाजमहल (1460), होशंग का मक़बरा (1440), जामा मस्जिद (1440), हिंडोला महल (1425), धार की लाट मस्जिद (1405), चंदेरी का बदल महल फाटक (1460), कुशक महल (1445), शहज़ादी का रौजा (1450); दक्षिणी शैली (1347-1617): जैसे गुलबर्गा की जामा मस्जिद (1367) और हफ्त गुंबज (1378), बीदर का मदरसा (1481), हैदराबाद की चारमीनार (1591) आदि; बीजापुर खानदेश शैली (1425-1660), जैसे बीजापुर के गोलगुंबज (1660), रौजा इब्राहीम (1615) और जामा मस्जिद (1570), थालनेर खानदेश के फारूकी वंश के मकबरे (15 वीं शती); और कश्मीर शैली (15-17 वीं शती) : जैसे श्रीनगर की जामा मस्जिद (1400), शाह हमदन का मक़बरा (17 वीं शती) आदि, सम्मिलित हैं।
तीसरे वर्ग में मुग़ल शैली आती है, जिसके उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर आदि में किलों, मकबरों, राजमहलों, उद्यान मंडपों आदि के रूप में मौजूद हैं। इसी काल में कला पत्थर से बढ़कर संगमरमर तक पहुँची और दिल्ली के दीवाने ख़ास, मोती मस्जिद, जामा मस्जिद और आगरा के ताजमहल जैसी विश्वविख्यात कृतियाँ तैयार हुई।

बृहत्तर भारत का वास्तु
भारतीय कला के उत्कृष्ट नमूने भारत के बाहर लंका, नेपाल, बर्मा (वर्तमान म्यांमार), स्याम, जावा, बाली, हिंदचीन और कंबोडिया में भी मिलते हैं। नेपाल के शंभुनाथ, बोधनाथ, मामनाथ मंदिर, लंका में अनुराधापुर का स्तूप और लंकातिलक मंदिर, बरमा के बौद्ध मठ और पगोडा, कंबोडिया में अंकोर के मंदिर, स्याम में बैंकॉक के मंदिर, जावा में प्रांबनाम का बिहार, कलासन मंदिर और बोरोबंदर स्तूप आदि हिंदू और बौद्ध वास्तु के व्यपक प्रसार के प्रमाण हैं। जावा में भारतीय संस्कृति के प्रवेश के कुछ प्रमाण 4वीं शती ईसवी के मिलते हैं। वहाँ के अनेक स्मारकों से पता लगता है कि मध्य जावा में 625 से 928 ई. तक वास्तुकला का स्वर्णकाल और पूर्वी जावा में 928 से 1478 ई. तक रजतकाल था।

बीसवीं सदी का वास्तु
सन्‌ 1911 ई. में ब्रिटिश राज्य उन्नति के शिखर पर था। उसी समय दिल्ली दरबार में घोषणा की गई और साम्राज्य की राजधानी के अनुरूप एक नई दिल्ली में और सारे भारत के ज़िला सदर स्थानों तक में, सुंदर इमारतें बनवाई, जिनमें अनेक कार्यालय भवन, गिरजे और ईसाई क़ब्रिस्तान कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। सरकारी प्रयास से नई दिल्ली में राजभवन (अब राष्ट्रपति भवन), सचिवालय भवन, संसद भवन जैसी भव्य इमारतें बनीं, जिनमें पाश्चात्य कला के साथ हिंदू, बौद्ध और मुस्लिम कला का सुखद सम्मिश्रण दिखाई देता है।

मंदिर वास्तु भी, जो केवल व्यक्तिगत प्रयास से अपना अस्तित्व बनाए रहा, कुछ कुछ इसी दिशा में झुका। मुस्लिम वास्तु के अनुकरण पर अशोककालीन शिलालेखों की प्रथा पुन: प्रतिष्ठित हुई और मंदिरों मे भीतर बाहर, मूर्तियों और चित्रों के साथ लेखों को भी स्थान मिलने लगा। दिल्ली का लक्ष्मीनारायण मंदिर और हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी का शिवमंदिर बीसवीं शती के मंदिरवास्तु की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं। मंदिरों के अतिरिक्त राजाओं के महल और विद्यालय आदि भी कला को प्रश्रय देते रहे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की सभी इमारतें और वाराणसी का भारतमाता मंदिर, काशी विश्वनाथ की मंदिरों वाली नगरी में दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण के केंद्र हैं। कुशीनगर में बने निर्वाण विहार, बुद्ध मंदिर और सरकारी विश्रामगृह में बौद्ध कला को पुनर्जीवन मिला है। दिल्ली में लक्ष्मीनारायण मंदिर के साथ भी एक बुद्ध मंदिर है। इस प्रकार किसी शैली विशेष के पति अनाग्रह और उत्कृष्टता के लिए समन्वय 20वीं सदी की विशेषता समझी जा सकती है।

गुहा वास्तु
गुहा वास्तु भारतीय प्राचीन वास्तुकला का एक बहुत ही सुन्दर नमूना है। अशोक के शासनकाल से गुहाओं का उपयोग आवास के रूप में होने लगा था। गया के निकट बराबर पहाड़ी पर ऐसी अनेक गुफ़ाएँ विद्यमान हैं, जिन्हें सम्राट अशोक ने आवास योग्य बनवाकर आजीवकों को दे दिया था। अशोककालीन गुहायें सादे कमरों के रूप में होती थीं, लेकिन बाद में उन्हें आवास एवं उपासनागृह के रूप में स्तम्भों एवं मूर्तियों से अलंकृत किया जाने लगा। यह कार्य विशेष रूप से बौद्धों द्वारा किया गया।

विश्व दुग्ध दिवस / World Milk Day

विश्व दुग्ध दिवस World Milk Day

विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day) संपूर्ण विश्व में 1 जून को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दूध के संबंध में ध्यान आकर्षित करना एवं दूध उद्योग से जुड़ी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार के लिए अवसर प्रदान करना है। प्रथम विश्व दुग्ध दिवस 1 जून, 2001 को मनाया गया था।

राष्ट्रीयकरण
इस उत्सव में वर्ष दर वर्ष भाग लेने वाले देशों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। तब से, पूरे विश्व भर में दूध और दुग्ध उद्योग से संबंधित क्रिया-कलापों को प्रचार-प्रसार में हर वर्ष ध्यान केन्द्रित करने के लिये इसे मनाया जाता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सव संबंधित क्रिया-कलापों को आयोजित करने के द्वारा इस उत्सव का राष्ट्रीयकरण किया जाता है। पूरे जीवन भर सभी के लिये दूध और इसके उत्पादों के महत्व के बारे में लोगों में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के द्वारा 1 जून को विश्व स्तर पर हर वर्ष मनाने के लिये विश्व दुग्ध दिवस की पहली बार स्थापना की गयी थी। इसे 1 जून को मनाने के लिये चुना गया था, क्योंकि इस समय के दौरान बहुत सारे देशों के द्वारा विश्व दुग्ध दिवस पहले से ही मनाया जा रहा था।

मनाने का कारण
1 जून को वार्षिक आधार पर पूरे विश्व भर के लोगों के द्वारा विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है। प्राकृतिक दुध के सभी पहलूओं के बारे में आम जनता की जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे मनाया जाता है, जैसे- इसकी स्वाभाविक उत्पत्ति, दूध का पोषण संबंधी महत्व और विभिन्न दूध उत्पाद सहित पूरे विश्वभर में इसका आर्थिक महत्व। विभिन्न उपभोक्ताओं और दूध उद्योग के कर्मचारियों के भाग लेने के द्वारा कई देशों (मलेशिया, कोलंबिया, रोमानिया, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका आदि) में इसे मनाने की शुरुआत की गयी।

विश्व दुग्ध दिवस के पूरे उत्सव के दौरान दूध को एक वैश्विक भोजन के रूप में केन्द्रित किया जाता है। ऑनलाइन अपने वेबसाइट पर अंतरराष्ट्रीय डेयरी संघ के द्वारा ढेर सारे विज्ञापन संबंधी क्रिया-कलापों, एक स्वस्थ और नियंत्रित भोजन के रूप में दूध के महत्व को बताना, की शुरुआत की गयी है। पूरे दिन प्रचार संबंधी गतिविधियों के द्वारा आम लोगों के लिये दूध के महत्व के संदेश को फैलाने के लिये एक-साथ काम करने के लिये उत्सव में स्वास्थ्य संस्थाओं से विभिन्न सदस्य भाग लेते हैं। दूध की सच्चाई को उनको समझाने के लिये विश्व दुग्ध दिवस उत्सव बड़ी जनसंख्या पर असर डालता है। दूध शरीर के द्वारा ज़रूरी सभी पोषक तत्वों का एक बहुत अच्छा स्रोत है, जिसमें कैल्सियम, मैग्नीशियम, जिंक, फॉसफोरस, आयोडीन, आइरन, पोटेशियम, फोलेट्स, विटामिन ए, विटामिन डी, राइबोफ्लेविन, विटामिन बी12, प्रोटीन, स्वस्थ फैट आदि मौजूद होता है। ये बहुत ही ऊर्जायुक्त आहार होता है, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा उपलब्ध कराता है, क्योंकि इसमें उच्च गुणवत्ता के प्रोटीन सहित आवश्यक और गैर-आवश्यक अमीनो एसिड और फैटी एसिड मौजूद होता है।

गतिविधियाँ
चूंकि दूध एक महत्वपूर्ण आहार होता है, इसलिये सभी को इसे रोज लेना चाहिये, दूध के महत्व के बारे में आम लोगों के बीच विश्व दूग्ध दिवस उत्सव एक असरदार क्रांति ले आया है। नियंत्रित आहार में दूध को जोड़ने के बारे में नये संदेश को प्राप्त करने के लिये पूरे विश्व भर में हरेक के लिये हर वर्ष विश्व दुग्ध दिवस उत्सव एक संपूर्ण मौका ले आता है। कई सारे प्रचारात्मक गतिविधियों के द्वारा लोगों के बीच संदेश को भेजने के लिये एक साथ काम करने द्वारा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघ के सदस्यों के द्वारा इसे मनाया जाता है। उनके नियमित आहार के रूप में दूध और डेयरी उत्पादों के उपभोग के बारे में आम लोगों को बढ़ावा देने के लिये 2001 में संयुक्त राष्ट्र आहार और कृषि संगठन के द्वारा विश्व दुग्ध दिवस उत्सव की शुरुआत की गयी थी। पूरे विश्व भर में कई देशों में इस कार्यक्रम के द्वारा दूध के सभी पहलूओं को वार्षिक तौर पर मनाया जाता है। ज्यादा प्रभाव लाने के लिये इस उत्सव में भाग लेने वाले देशों की संख्या हर वर्ष बढ़ती है।

दूध, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी फायदों के प्रचार के लिये बाज़ार आदि को लक्ष्य बनाने के लिये संप्रेषण कार्यक्रम, एसएएमपीआरओ (दक्षिण अफ्रिका दूध संसाधक संगठन) के द्वारा दूध के स्क्रीन उपभोक्ता शिक्षा प्रोजेक्ट सहित एनजीओ, नीजि और सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं के द्वारा उत्सव के विषय-वस्तु से संबंधित संबंधित विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। उपभोक्ताओं के बीच दूध के पोषण स्वास्थ्य उपयोगिता को विशेष रुप से ध्यान दिलाने के लिये प्रेस विज्ञप्ति, आर्टीकल्स, खबर आदि प्रकाशित किये जाते हैं। बच्चों के बीच दूध के मुफ़्त पैकेट वितरित करने के लिये स्थानीय स्तर पर मशहूर लोगों को मुफ़्त दूध वितरण कैंप पर लगाया जाता है। बहुत सारी गतिविधियों के माध्यम से ऑनलाइन राष्ट्रीय डेयरी परिषद के द्वारा इसे मनाया जाता है। विभिन्न दूसरे कार्यक्रम जैसे परिचर्चा, प्रश्न-उत्तर प्रतियोगिता, खेल गतिविधियाँ, निबंध लेखन आदि स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थीयों को बढ़ावा देने के लिये आयोजित किये जाते हैं।

विश्व दुग्ध दिवस का थीम

विश्व दुग्ध दिवस 2012 का थीम था “ताजा दूध पीयें, शरीर फिट रहे, दिमाग तेज”।

विश्व दुग्ध दिवस 2013 का थीम था “दक्षिणपूर्व एशिया क्षेत्र के समृद्धि और स्वास्थ्य के लिये दूध”।

विश्व दुग्ध दिवस 2014 का थीम था “मानव के लिये पहला भोजन दूध है” और “विश्व स्तरीय पोषण”।

विश्व दुग्ध दिवस 2015 का थीम अभी तक उजागर नहीं हुआ है।

अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस

अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस

अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस अथवा अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस  प्रत्येक वर्ष 1 जून को मनाया जाता है। यह दिवस सबसे पुराना अंतर्राष्ट्रीय उत्सव है जो 1950 से मनाया जा रहा है।

उद्देश्य
इसका उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना है। रूस में आज के दिन अनाथ, विकलांग और ग़रीब बच्चों की समस्याओं की ओर विशेष रूप से लोगों का ध्यान खींचा जाता है। बच्चों को तोहफ़े दिए जाते हैं और उनके लिए विशेष समारोहों का आयोजन किया जाता है।

शुरुआत
रूस में अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस पहली बार सन 1949 में मनाया गया था। इसका निर्णय मॉस्को में अंतर्राष्ट्रीय महिला लोकतांत्रिक संघ की एक विशेष बैठक में किया गया था। 1 जून सन 1950 को दुनिया भर के 51 देशों में 'अंतर्राष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस' पहली बार मनाया गया था।

आयोजन एवं कार्यक्रम
रूस की राजधानी मॉस्को में इस दिन भांति-भांति की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं जिनमें बच्चों को पुरस्कार बांटे जाते हैं। नृत्य-संगीत कार्यक्रम भी होते हैं और साथ ही विभिन्न प्रदर्शनियां तथा ज्ञानवर्धक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। 2007 से 'अंतर्राष्ट्रीय बाल-रक्षा दिवस' पर क्रेमलिन के 'महागिरजा चौक' पर मॉस्को के स्कूल छात्रों के लिए घुड़सवार और पैदल प्रहरियों की ड्यूटी बदलने की समारोही परेड होती है जिसमें राष्ट्रपति रेजिमेंट के सैनिक भाग लेते हैं। 2013 में क्रेमलिन अश्वारोहण विद्यालय के किशोर छात्रों ने भी इस समारोह में भाग लिया था।

विश्व धूम्रपान निषेध दिवस

विश्व धूम्रपान निषेध दिवस

विश्व धूम्रपान निषेध दिवस अथवा 'विश्व तम्बाकू निषेध दिवस' अथवा 'अंतर्राष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस' प्रत्येक वर्ष 31 मई को मनाया जाता है। तम्बाकू से होने वाले नुक़सान को देखते हुए साल 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सदस्य देशों ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके द्वारा 7 अप्रैल, 1988 से इस दिवस को मनाने का फ़ैसला किया गया। इसके बाद हर 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों ने 31 मई का दिन निर्धारित करके धूम्रपान के सेवन से होने वाली हानियों और ख़तरों से विश्व जनमत को अवगत कराके इसके उत्पाद एवं सेवन को कम करने की दिशा में आधारभूत कार्यवाही करने का प्रयास किया है। इसी दिशा में प्रतिवर्ष प्रतीकात्मक रूप में एक नारा निर्धारित किया जाता है। वर्ष 2012 में पूरी दुनिया में धूम्रपान के उत्पाद एवं उसके वितरण में धूम्रपान उद्योगों की स्पष्ट भूमिका के दृष्टिगत 31 मई को नारा दिया गया- "सावधान! हम बहुराष्ट्रीय धूम्रपान उद्योगों को बंद कर देंगे"।

भारत में विभिन्न कार्यक्रम

इस दिन विभिन्न कार्यक्रम कर लोगों को तम्बाकू से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नुक़सान के बारे में बताया जाता है। हालांकि भारत में भी सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी है, लेकिन लचर क़ानून व्यवस्था के चलते इस पर कोई अमल नहीं हो पा रहा है। लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते हुए देखा जा सकता है। भारत में आर्थिक मामलों की संसदीय समिति पहले ही राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम को मंज़ूरी दे चुकी है। इसका मक़सद तम्बाकू नियंत्रण क़ानून के प्रभावी क्रियान्वयन और तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों तक जागरूकता फैलाना है। इसके लिए 11वीं योजना में कुल वित्तीय परिव्यय 182 करोड़ रुपये रखा गया है। इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण देश शामिल है, जबकि शुरुआती चरण में 21 राज्यों के 42 ज़िलों पर ध्यान केन्द्रित किए गए हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट
दुनियाभर में तम्बाकू सेवन का बढ़ता चलन स्वास्थ्य के लिए बेहद नुक़सानदेह साबित हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी इस पर चिंता ज़ाहिर की है। तम्बाकू से संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल क़रीब 5 मिलियन लोगों की मौत हो रही है। जिनमें लगभग 1.5 मिलियन महिलाएं शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में 80 फ़ीसदी पुरुष तम्बाकू का सेवन करते हैं, लेकिन कुछ देशों की महिलाओं में तम्बाकू सेवन की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। दुनियाभर के धूम्रपान करने वालों का क़रीब 10 फ़ीसदी भारत में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में क़रीब 25 करोड़ लोग गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का आदि के ज़रिये तम्बाकू का सेवन करते हैं।


विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ दुनिया के 125 देशों में तम्बाकू का उत्पादन होता है। दुनियाभर में हर साल 5.5 खरब सिगरेट का उत्पादन होता है और एक अरब से ज़्यादा लोग इसका सेवन करते हैं। भारत में 10 अरब सिगरेट का उत्पादन होता है। भारत में 72 करोड़ 50 लाख किलो तम्बाकू की पैदावार होती है। भारत तम्बाकू निर्यात के मामले में ब्राज़ील, चीन, अमरीका, मलावी और इटली के बाद छठे स्थान पर है। आंकड़ों के मुताबिक़ तम्बाकू से 2022 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की आय हुई थी। विकासशील देशों में हर साल 8 हज़ार बच्चों की मौत अभिभावकों द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के कारण होती है। दुनिया के किसी अन्य देश के मुक़ाबले में भारत में तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। तम्बाकू पर आयोजित विश्व सम्मेलन और अन्य अनुमानों के मुताबिक़ भारत में तम्बाकू सेवन करने वालों की तादाद क़रीब साढ़े 29 करोड़ तक हो सकती है।

तम्बाकू सेवन में महिलाओं की भागीदारी

देश के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि शहरी क्षेत्र में केवल 0.5 फ़ीसदी महिलाएं धूम्रपान करती हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह संख्या दो फ़ीसदी है। आंकड़ों की मानें तो पूरे भारत में 10 फ़ीसदी महिलाएं विभिन्न रूपों में तंबाकू का सेवन कर रही हैं। शहरी क्षेत्रों की 6 फ़ीसदी महिलाएं और ग्रामीण इलाकों की 12 फ़ीसदी महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं। अगर पुरुषों की बात की जाए तो भारत में हर तीसरा पुरुष तम्बाकू का सेवन करता है। डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ कई देशों में तम्बाकू सेवन के मामले में लड़कियों की तादाद में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है। हालांकि तम्बाकू सेवन के मामले में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ़ 20 फ़ीसदी ही है। महिलाओं और लड़कियों में तम्बाकू के प्रति बढ़ रहे रुझान से गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। डब्लूएचओ में गैर-संचारी रोग की सहायक महानिदेशक डॉक्टर आला अलवन का कहना है कि तम्बाकू विज्ञापन महिलाओं और लड़कियों को ही ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं। इन नए विज्ञापनों में ख़ूबसूरती और तंबाकू को मिला कर दिखाया जाता है, ताकि महिलाओं को गुमराह कर उन्हें उत्पाद इस्तेमाल करने के लिए उकसाया जा सके। बुल्गारिया, चिली, कोलंबिया, चेक गणराज्य, मेक्सिको और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के क़रीब 151 देशों में किए गए सर्वे के मुताबिक़ लड़कियों में तंबाकू सेवन की प्रवृत्ति लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा बढ़ रही है।

मुंह का कैंसर की होने की आशंका

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ तम्बाकू या सिगरेट का सेवन करने वालों को मुंह का कैंसर की होने की आशंका 50 गुना ज़्यादा होती है। तम्बाकू में 25 ऐसे तत्व होते हैं जो कैंसर का कारण बन सकते हैं। तम्बाकू के एक कैन में 60 सिगरेट के बराबर निकोटिन होता है। एक अध्ययन के अनुसार 91 प्रतिशत मुंह के कैंसर तम्बाकू से ही होते हैं। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल और डॉ. बी सी राय का कहना है कि एक दिन में 20 सिगरेट पीने से महिलाओं में हार्ट अटैक का ख़तरा 6 गुना बढ़ जाता है। एक दिन में 20 सिगरेट पीने से पुरुषों में हृदयाघात का ख़तरा 3 गुना बढ़ जाता है। पहली बार हृदयाघात के लिए धूम्रपान 36 फ़ीसदी मरीज़ों में ज़िम्मेदार होता है। ऐसे हृदय रोगी जो लगातार धूम्रपान करते रहते हैं उनमें दूसरे हृदयाघात का ख़तरा ज़्यादा रहता है साथ ही अकस्मात मौत का ख़तरा भी बढ़ जाता है। बाई पास सर्जरी के बाद लगातार धूम्रपान करते रहने से मृत्यु, हृदय संबंधी बीमारी से मौत या फिर से बाईपास का ख़तरा ज़्यादा होता है। एंजियोप्लास्टी के बाद लगातार धूम्रपान करने से मौत और हृदयाघात का ख़तरा बढ़ जाता है। जिन मरीज़ों में हार्ट फंक्शनिंग 35 फ़ीसदी से कम हो, उनमें धूम्रपान से मौत का ख़तरा ज़्यादा होता है। जो लोग लगातार धूम्रपान करते रहते हैं, उनमें हो सकता है कि रक्त दाब (ब्लड प्रेशर) की दवाएं असर न करें।

प्रतिवर्ष 50 लाख लोगों की मौत

विश्व स्वास्थ्य संगठन की घोषणा के आधार पर इस समय समूचे विश्व में प्रतिवर्ष 50 लाख से अधिक व्यक्ति धूम्रपान के सेवन के कारण अपनी जान से हाथ धो रहे हैं। उल्लेखनीय है कि यदि इस समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में कोई प्रभावी क़दम नहीं उठाया गया तो वर्ष 2030 में धूम्रपान के सेवन से मरने वाले व्यक्तियों की संख्या प्रतिवर्ष 80 लाख से अधिक हो जायेगी। धूम्रपान, इसका सेवन करने वालों में से आधे व्यक्तियों की मृत्यु का कारण बन रहा है और औसतन इससे उनकी 15 वर्ष आयु कम हो रही है। हर प्रकार का धूम्रपान- 90 प्रतिशत से अधिक फेफड़े के कैंसर, ब्रैन हैम्ब्रेज और पक्षाघात का महत्त्वपूर्ण कारण है। आज विश्व के मशीनी जीवन में कैंसर, मृत्यु का दूसरा कारण है और सिगरेट इस बीमारी में ग्रस्त होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि फेफड़े के कैंसर से ग्रस्त होने और सिगरेट का सेवन करने वाले पुरुषों में मृत्यु की संभावना सिगरेट का सेवन न करने वाले पुरुषों से 23 गुना अधिक है जबकि इस कैंसर से ग्रस्त होने की संभावना सिगरेट का सेवन करने वाली महिलाओं में सिगरेट का प्रयोग न करने वाली महिलाओं से 13 गुना अधिक है। सिगरेट- मुंह, मेरुदंड, कंठ और मूत्राशय के कैंसर में सीधे रूप से प्रभावी हो सकता है। सिगरेट में मौजूद कैंसर जनक पदार्थ शरीर की कोशिकाओं पर ऐसा प्रभाव डालते हैं जिससे उसका उचित विकास नहीं हो पाता और शरीर की कोशिकाओं के विकास में ध्यानयोग्य विघ्न उत्पन्न होता है। इस प्रकार सिगरेट शरीर की कोशिकाओं के नष्ट होने और उनके कैंसर युक्त होने का कारण बनता है। शोध इस बात के सूचक हैं कि जो व्यक्ति सिगरेट का सेवन करते हैं उनमें मूत्राशय के कैंसर से ग्रस्त होने की संभावना उन लोगों से चार गुना अधिक होती है जिन्होंने अपने जीवन में एक बार भी सिगरेट को हाथ नहीं लगाया है। लम्बे समय तक सिगरेट सेवन के दूसरे दुष्परिणाम- मुंह, गर्भाशय, गुर्दे और पाचक ग्रंथि के कैंसर हैं। विभिन्न शोधों से जो परिणाम सामने आये हैं वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि धूम्रपान, रक्त संचार की व्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव डालता है। धूम्रपान का सेवन और न चाहते हुए भी उसके धूएं का सामना, हृदय और मस्तिष्क की बीमारियों का महत्त्वपूर्ण कारण है। इन अध्ययनों में पेश किये गये आंकड़े इस बात के सूचक हैं कि कम से कम सिगरेट का प्रयोग भी जैसे एक दिन में पांच सिगरेट या कभी कभी सिगरेट का सेवन अथवा धूम्रपान के धूएं से सीधे रूप से सामना न होना भी हृदय की बीमारियों से ग्रस्त होने के लिए पर्याप्त है। धूम्रपान के धूएं में मौजूद पदार्थ जैसे आक्सीडेशन करने वाले, निकोटीन, कार्बन मोनो आक्साइड जैसे पदार्थ हृदय, ग्रंथियों और धमनियों से संबंधित रोगों के कारण हैं। धूम्रपान का सेवन इस बात का कारण बनता है कि शरीर पर इन्सुलिन का प्रभाव नहीं होता है और इस चीज़ से ग्रंथियों एवं गुर्दे को क्षति पहुंच सकती है।

आर्थिक क्षति
धूम्रपान के सेवन के हानिकारक प्रभावों से केवल लोगों के स्वास्थ्य को ख़तरा नहीं है बल्कि इससे आर्थिक क्षति भी पहुंचती है विशेषकर यह निर्धन लोगों की निर्धनता में वृद्धि का कारण है। धूम्रपान के उद्योगों को बनाने का मूल उद्देश्य, ग्राहकों एवं नशेड़ी व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि है और जाने -अनजाने एवं न चाहते हुए भी यह निर्धन वर्ग को क्षति पहुंचाता है। अधिकांश देशों में धूम्रपान का सेवन धनी लोगों की अपेक्षा निर्धन लोगों में अधिक है और कुछ अवसरों पर यह भी देखने को मिलता है कि कम आय वाले लोग अधिक संख्या में धूम्रपान का सेवन करते हैं।

सिगरेट की लत

तीसरी दुनिया के देशों में सिगरेट पीने वालों की आयु कम होती है और इन देशों की युवा जनसंख्या के दृष्टिगत उनमें मादक पदार्थों की लत पड़ जाने और दूसरी सामाजिक एवं सांस्कृतिक बुराइयों में वृद्धि की आशंका होती है। इस संबंध में होने वाले अध्ययन के अनुसार यद्यपि सिगरेट का सेवन करने वाला हर व्यक्ति नशेड़ी नहीं बन जाता है परंतु सिगरेट का सेवन करने वाले अधिकांश लोग बड़ी जल्दी नशेड़ी बन जाते हैं। वास्तव में सिगरेट नशेड़ी बनने के प्रवेश द्वार की भूमिका निभाता है। स्पष्ट है कि समाज में सिगरेट का सस्ता होना, उसकी तस्करी और उस तक सरल पहुंच, कम आय वाले वर्ग एवं युवाओं में सिगरेट पीने के रुझान में वृद्धि का महत्त्वपूर्ण कारण है।

अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध सप्ताह

अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस आम जनमत को धूम्रपान के विनाशकारी प्रभावों से अधिक जागरुक बनाकर समाज के लोगों को धूम्रपान के सेवन से बचाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण अवसर है क्योंकि धूम्रपान समाज के स्वास्थ्य के लिए एक ख़तरनाक व हानिकारक चीज़ है। अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध सप्ताह में, जो 25 मई से आरंभ होता है, धूम्रपान उद्योग, स्वास्थ्य के लक्ष्यों को व्यावहारिक होने की दिशा में रुकावट, धूम्रपान उद्योग के मुक़ाबले में धार्मिक मान्यताएं, धूम्रपान उद्योग की एक अन्य चाल हुक्का, युवा, नवयुवा और महिलाएं धूम्रपान उद्योग के लक्ष्य, धूम्रपान को रोकना सबकी ज़िम्मेदारी, धूम्रपान के विस्तार के मुक़ाबले में विधि पालिका, न्याय पालिका और कार्यपालिका की ज़िम्मेदारी और अंततः धूम्रपान की अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों को बंद किया जाये जैसे विषयों की समीक्षा की जाती है ताकि इस मार्ग से धूम्रपान के सेवन में कमी और आम जनमत के स्वास्थ्य में वृद्धि की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम उठाया जा सके। स्पष्ट है कि केवल नारों से धूम्रपान की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से न तो मुक़ाबला किया जा सकता है और न ही इस संघर्ष की समाप्ति की आशा की जा सकती है। जिन लोगों ने वर्षों से सिगरेट के व्यापार और धूम्रपान के दूसरे पदार्थों से असाधारण लाभ कमाया है वे अपने हितों की रक्षा के लिए किसी प्रकार के काम में संकोच से काम नहीं लेंगे। धूम्रपान के सेवन के ख़तरनाक परिणामों से आम जनमत की जानकारी में वृद्धि, विभिन्न विशेषकर प्रगतिशील देशों में सिगरेट के सेवन को कम सकती है। धूम्रपान के सेवन का सामना कर रहे देशों के अधिकारियों का भी भारी दायित्व है। क्योंकि धूम्रपान को कम करने के लिए हर प्रकार का प्रयास आम समाज के स्वास्थ्य की दिशा में एक क़दम है।