सूर्य के बारे में जानकारी | Surya ke bare mein jankari | Information about Sun in Hindi

सूर्य के बारे में जानकारी | Surya ke bare mein jankari | Information about Sun 




1. सूर्य, सौर मंडल के केंद्र में स्थित है, जहां यह अब तक की सबसे बड़ी वस्तु है। सूर्य सौर मंडल के द्रव्यमान का 99.8 प्रतिशत है और पृथ्वी के व्यास का लगभग 109 गुना है - लगभग एक मिलियन पृथ्वी सूर्य के अंदर फिट हो सकती है।

2. सूरज ज्यादातर हाइड्रोजन (75%) से बना है, उसके बाद हीलियम है। शेष पदार्थों में सात अन्य तत्व शामिल हैं - ऑक्सीजन, कार्बन, नियॉन, नाइट्रोजन, मैग्नीशियम, लोहा और सिलिकॉन।

3. सूर्य परमाणु संलयन (nuclear fusion) नामक प्रक्रिया से ऊर्जा उत्पन्न करता है।

4. सूर्य का लगभग पूरी तरह गोल आकार है क्योंकि सूर्य की ठोस सतह नहीं है, सूर्य अब तक की सबसे बड़ी गोल वस्तु है।

5. हां, सूर्य, वास्तव में हमारा पूरा सौर मंडल मिल्की वे गैलेक्सी के केंद्र के चारों ओर परिक्रमा करता है। मिल्की वे का एक पूरा चक्कर लगाने में हमारे सौर मंडल को लगभग 230 मिलियन वर्ष लगते हैं।




क्षुद्रग्रह        अंतरिक्ष यात्री        मंगल

अंतरिक्ष        यूरेनस        बुध

प्लूटो        नेपच्यून        शनि

शुक्र        बौने ग्रह        याक

धूमकेतु        पृथ्वी        चीता

ब्लैक होल        सूर्य        नेवला


6. सूर्य की रोशनी, प्रकाश की गति से यात्रा करती है। सूर्य की रौशनी पृथ्वी तक पहुंचने में औसतन 8 मिनट और 20 सेकंड लगते है।

7. पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी बदलती रहती है। यह इसलिए है क्योंकि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक अण्डाकार कक्षा पथ पर यात्रा करती है। दोनों के बीच की दूरी 147 से 152 मिलियन किलोमीटर है।

8. सूर्य के अंदर तापमान 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।

9. सूर्य का वातावरण तीन परतों से बना है: फोटोस्फीयर, क्रोमोस्फीयर और कोरोना।

10. सूरज का जन्म लगभग 4.6 बिलियन साल पहले हुआ था। कई वैज्ञानिको का मानन है कि सूर्य और बाकी सौरमंडल एक विशालकाय गैस और धूल के घूमते हुए बादल से बने हैं, जिसे सौर नेबुला के रूप में जाना जाता है।
धूमकेतु के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Comet in Hindi






1. धूमकेतु एक अपेक्षाकृत छोटा सौर मंडल पिंड है, जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

2. धूमकेतु बर्फ, धूल और छोटे चट्टानी कणों से बने होते हैं।

3. हैली धूमकेतु सबसे प्रसिद्ध धूमकेतु है।

4. हैली धूमकेतु को पृथ्वी से हर 75 से 76 वर्ष में एक बार नग्न आंखों से देखा जा सकता है।

5. हैली धूमकेतु 1986 में आंतरिक सौर मंडल में दिखाई दिया था और 2061 में कुछ समय बाद फिर से आएगा।



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6. धूमकेतु हेल-बोप आखिरी बार 1997 में दिखाई दिया था और लगभग 2,300 वर्षों तक फिर से दिखाई नहीं देगा।

7. धूमकेतु ग्रहों की तरह सूर्य की परिक्रमा करता है।

8. वर्तमान में 3,000 से अधिक ज्ञात धूमकेतु हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे सौर मंडल में एक बिलियन तक धूमकेतु हैं।

9. एक महान धूमकेतु वह है जो दूरबीन की आवश्यकता के बिना पृथ्वी से दिखाई देने के लिए पर्याप्त उज्ज्वल है। हर दस साल में लगभग एक महान धूमकेतु होता है।

10. एक धूमकेतु का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि वह सूर्य के कितने करीब है। जैसे-जैसे धूमकेतु सूर्य के करीब आता है, उसके नाभिक की सतह पर बर्फ वाष्पीकृत हो जाती है और नाभिक के चारों ओर कोमा नामक बादल बन जाता है जो 80,000 किमी तक फैल सकता है।

निराधार बिग बैंग थ्योरी की सच्चाई (The Truth Of False Big Bang Theor

निराधार बिग बैंग थ्योरी की सच्चाई (The Truth Of False Big Bang Theory)



जब आप किसी Science Student से यह सवाल करते होंगे की हमारा ब्रह्माण्ड कैसे बना  ? तो वह बिना किसी तर्क के झट से यही जवाब देता होगा कि यह ब्रह्माण्ड बिग बैंग थ्योरी ( Big Bang Theory ) से बना। और सामान्यतः आजकल की Physics की किताबो में भी आपको यही पढ़ने को मिलेगा। आज  के इस आर्टिकल में हम logically यह देखेंगे की पश्चिमी देशो के द्वारा माननी गयी यह बिग बैंग थ्योरी कितनी सच है।

निराधार बिग बैंग थ्योरी की सच्चाई (The Truth Of False Big Bang Theory)

दोस्तों जहाँ तक मैं जानता हु कि आपको बिग बैंग थ्योरी ( Big Bang Theory ) के बारे में पता होगा। लेकिन फिर भी अगर किसी भाई को नहीं पता है तो मैं संक्षेप में बिग बैंग थ्योरी को अपने शब्दों में आपको समझाता हूँ उसके बाद आगे का बढ़ेंगे, और जानेंगे कि तर्क की कसौटी पर Big Bang Theory कितनी खरी उतरती है ?

क्या है बिग बैंग थ्योरी ( Big Bang Theory ) –
पश्चिमी देशो के अनुसार लगभग बारह से चौदह अरब वर्ष पूर्व जब कुछ भी नहीं था तब सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक परमाण्विक इकाई यानी एक बहुत छोटे बिंदु (इतना छोटा की जिसको देखा नही जा सकता ) के रूप में था। फिर अचानक से एक बहुत बड़ा विस्फोट हुआ जिस से अत्यधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ, और सारा ब्रह्माण्ड फैलने लगा। यह ऊर्जा इतनी अधिक थी जिसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जा रहा है। बिग बैंग सिद्धांत के आरंभ का इतिहास आधुनिक भौतिकी में जॉर्ज लेमैत्रे ने लिखा हुआ है जो एक रोमन कैथोलिक पादरी और वैज्ञानिकथे । हालाँकि इसका कोई तथ्य कोई प्रमाण मौजूद नहीं है फिर भी यह सिद्धांत आजकल बहुत प्रचलन में है। आशा है की आप इतना समझ गए होंगे की बिग बैंग थ्योरी क्या है और यदि आपको इसके बारे में और अधिक विस्तार से जानना है तो आप हमारी यह पोस्ट पढ़ सकते हैं –  बिग बैंग थ्योरी क्या है ?

तर्क की कसौटी पर बिग बैंग थ्योरी कितनी खरी उतरती है ?
जैसे कि अपने ऊपर पढ़ा कि बिग बैंग थ्योरी के अनुसार अचानक एक बिंदु जिसमे कोई द्रव्यमान नहीं, जिसका कोई तापमान नहीं, जिसका कोई घनत्व नहीं उस से एक बड़ा धमाका हुआ और फिर सारा ब्रह्माण्ड ( Universe ) अस्तित्व में आ गया। जो नामुमकिन सा लगता है।

जिस बिंदु में कुछ नहीं था उस बिंदु से सब कुछ कैसे आ सकता है ?
अगर ऐसे ही अचानक यह विस्फोट हो गया था तो फिर अब कही ऐसे ही हवा में अचानक क्यों विस्फोट नहीं हो जाता है,  क्योंकि अगर बिना कारण धमाका हुआ तो अब भी तो बिना कारण छोटे बड़े धमाके होने चाहिए, सिर्फ उसी वक़्त क्यों हुआ ?
चलो हम मान लेते हैं की ईश्वर ने यह ब्रह्माण्ड बनाया किन्तु जब ईश्वर सब जगह व्याप्त है, तो फिर विस्फोट करने की जरुरत ही क्या थी ?
बिग बैंग थ्योरी को मानने वाले मानते हैं की उस बिंदु से अचानक एक धमाके के साथ Nothing से Everything पैदा हुआ। लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि Nothing से Everything तो दूर की बात है Nothing से Something भी पैदा नहीं हो सकता।
इस सिद्धान्त के अनुसार विस्फोट अपने आप हुआ । इसका कारण नहीं दिया जबकि बिना कारण और कर्त्ता के कुछ नहीं हो सकता ।
यदि अचानक एक धमाके से यह सारा ब्रह्माण्ड बन गया तो फिर जीव जंतु जिनमे भी जीवन है वह कैसे बन गए ?  अगर नास्तिक लोग कहे की यह सब कुछ अपने आप हो गया तो जीव जन्तुओ का पूरक पेड़ पौधों का बनाना और पेड़ पौधों का पूरक जीव जन्तुओ का बनना भी सामान्य नहीं लगता। 
बिग बैंग थ्योरी को आधा अधूरा बताया गया है जिस से बहुत सारे सवाल मन में आते हैं, और मन को एक संतोषपूर्ण उत्तर नहीं मिलता। अगर आप भी बिग बैंग थ्योरी पर थोड़ा गौर करेगे और तर्क वितर्क करेंगे और सोचेंगे तो आपको भी लगेगा की बिग बैंग थ्योरी ( Big Bang Theory ) एक काल्पनिक और निराधार थ्योरी है, जिसका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं। आइये अब थोड़ा प्राचीन शाश्त्रो के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में जानते हैं।

धार्मिक और मत पंथो के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
वैदिक धर्म ( हिन्दुओ) के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति –
वेदो में सृष्टि उत्पत्ति की जो बात कही गयी है वह विचारणीय है, क्योंकि वेदो में सृष्टि के निर्माण अच्छे से समझाया गया है, जिसको एक वैदिक वैज्ञानिक आचार्य अग्निब्रत नैष्ठिक ने वेदो का गहन अध्ययन करने के पश्चात् अपनी 2800 पन्नो की एक पुस्तक वेद विज्ञान आलोक में  बारीकी से समझाया है और सृष्टि निर्माण के इस सिद्धांत को उन्होंने नाम दिया है वैदिक रश्मि सिद्धांत ( Vaidik Rashmi Sidhant )। अब 2800 पन्नो की बात तो मैं यहाँ इतने कम समय में समझा नहीं सकता लेकिन संक्षेप में बता सकता हूँ।

वैदिक रश्मि थ्योरी के अनुसार शुरुवात में ब्रह्माण्ड अपनी मूल अवस्था में पुरे अनन्त तक फैला हुआ था, किन्तु  यह निष्क्रिय अवस्था ( Inactive mode ) में था। जिसमे तापमान, घनत्व, बल, गति, समय, दिशा, सब कुछ शून्य था। जिसको किसी भी तरह जाना नहीं जा सकता था। सारा Matter अत्यंत शांत अवस्था में था। अब इस बात को हम सब जानते हैं की ईश्वर अनंत है और सब जगह है उस Matter में भी था जो तब निष्क्रिय अवस्था में था तब ईश्वर ने उस प्रकृति को ॐ रश्मि द्वारा सर्वत्र प्रेरित किया। प्रथम प्रेरणा से ॐ रश्मि प्रकट होकर उस निष्क्रिय मैटर को प्रेरित करके उसके गुणों को जाग्रित कर देती है। और इस तरह से प्रकृति के गुण जागृत हो जाते हैं और क्रमशः बनता जाता है जिसको आप नीचे दिए चित्र में देख सकते हैं।

निराधार बिग बैंग थ्योरी की सच्चाई (The Truth Of False Big Bang Theory)

अगर और भी अधिक गहराई से इसको जानना है समझना है तो आप VedRiashi.com  से वेद विज्ञान अलोक किताब मंगवा कर अध्ययन कर सकते हैं।

ईसाइयत के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति –
बाइबिल के प्रथम चैप्टर जिसका नाम है उत्पत्ति उसके अनुसार परमेश्वर ने कहा उजियारा हो जा , और उजाला हो गया। फिर परमेश्वर ने कहा पेड़ पौधे हो जा और हो गए।  मतलब परमेश्वर ने जो कहा वो सब फटाफट हो गया और 6 दिन में सब कुछ बन गया।  ये बात भी कतई गले से नहीं उतरती। क्योंकि ईश्वर कभी बोलता नहीं है उसको जो करना होगा वह डायरेक्ट करेगा। क्योंकि बोलने का सहारा हम जीव  लेते हैं, और अपनी इन्द्रियों से सुनते हैं, देखते हैं, बोलते हैं, महसूस करते हैं ईश्वर को किसी भी चीज के लिए इन्द्रियों की या शरीर की आवश्यकता नहीं पड़ती।  क्योंकि वह जो करना चाहता है डायरेक्ट करेगा बोलने की जरुरत ही नहीं। बाइबिल की इस बात को कोई भी वैज्ञानिक नहीं मानता।

इस्लाम के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति –
वह वही तो है जिसने सारे आसमान व ज़मीन को छह: दिन में पैदा किए फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ जो चीज़ ज़मीन में दाखिल होती है और जो उससे निकलती है और जो चीज़ आसमान से नाज़िल होती है और जो उसकी तरफ चढ़ती है (सब) उसको मालूम है और तुम (चाहे) जहाँ कहीं रहो वह तुम्हारे साथ है और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है | सूरा 57 हदीद=आ-4

ख़ुदा ही तो है जिसने सारे आसमान और ज़मीन और जितनी चीज़े इन दोनो के दरमियान हैं छह: दिन में पैदा की फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ उसके सिवा न कोई तुम्हारा सरपरस्त है न कोई सिफारिशी तो क्या तुम (इससे भी) नसीहत व इबरत हासिल नहीं करते | सूरा 32सिजदा-आ० 4

ये सारी बातें भी बड़ी हास्यास्पद सी लगती हैं इसलिए इनपर माथापच्ची करने का कोई मतलब नहीं।

धूमकेतु के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Comet in Hindi

धूमकेतु के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Comet 


1. धूमकेतु एक अपेक्षाकृत छोटा सौर मंडल पिंड है, जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

2. धूमकेतु बर्फ, धूल और छोटे चट्टानी कणों से बने होते हैं।

3. हैली धूमकेतु सबसे प्रसिद्ध धूमकेतु है।

4. हैली धूमकेतु को पृथ्वी से हर 75 से 76 वर्ष में एक बार नग्न आंखों से देखा जा सकता है।

5. हैली धूमकेतु 1986 में आंतरिक सौर मंडल में दिखाई दिया था और 2061 में कुछ समय बाद फिर से आएगा।



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6. धूमकेतु हेल-बोप आखिरी बार 1997 में दिखाई दिया था और लगभग 2,300 वर्षों तक फिर से दिखाई नहीं देगा।

7. धूमकेतु ग्रहों की तरह सूर्य की परिक्रमा करता है।

8. वर्तमान में 3,000 से अधिक ज्ञात धूमकेतु हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे सौर मंडल में एक बिलियन तक धूमकेतु हैं।

9. एक महान धूमकेतु वह है जो दूरबीन की आवश्यकता के बिना पृथ्वी से दिखाई देने के लिए पर्याप्त उज्ज्वल है। हर दस साल में लगभग एक महान धूमकेतु होता है।

10. एक धूमकेतु का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि वह सूर्य के कितने करीब है। जैसे-जैसे धूमकेतु सूर्य के करीब आता है, उसके नाभिक की सतह पर बर्फ वाष्पीकृत हो जाती है और नाभिक के चारों ओर कोमा नामक बादल बन जाता है जो 80,000 किमी तक फैल सकता है।

डार्क एनर्जी क्या है | Dark Energy In hindi

डार्क एनर्जी क्या है | Dark Energy 


दोस्तों ब्रह्माण्ड से जुड़े हुए कई Topics पर मै पहले भी article लिख चूका हूँ। जिसको आपने पढ़ा तो अब पढ़ सकते है। ब्रह्माण्ड के बारे में और इसकी व्याख्य करने में तो हम इंसानों के शब्द ख़त्म हो जायेंगे। मगर Science की मदद से हम जितना भी अभी तक जान पाए हैं वह सबको जानना ही चाहिए। तो आज हम आपको बताने वाले हैं  Dark Energy के बारे में कि डार्क एनर्जी क्या है ? तो बिना वक़्त गंवाए शुरू करते हैं। और जानते डार्क एनर्जी के बारे में।

डार्क एनर्जी | Dark Energy
आपको बताते चले कि अभी तक हमको लगता की हमारा ब्रह्माण्ड सिर्फ अणु परमाणु, जीव, जंतु चट्टानों, ग्रह, उपग्रह, सितारों और आकाशगंगाओ से मिलकर बना हुआ है, जो हमें अपनी आँखों से साफ़ साफ़ दिखाई भी देते हैं। मगर यह बात सत्य नहीं है। क्योंकि जो Universe हमें अपनी आँखों से दिखाई देता है। वह ब्रह्माण्ड का केवल 4.9% ही है बाकी का 68.3% भाग Dark Energy तथा 26.8% भाग Dark matter से भरा पड़ा है जो हमें दिखाई ही नहीं देता। हमरा ब्रह्माण्ड तीन मुख्या चीजो से मिलकर बना हुआ है।
1.Dark Energy (68.3%)
2. Dark Matter (26.8%)
3. Ordinary matter (4.9%)
1990 के शुरवाती दशक तक हमें यह पता था कि हमारा ब्रह्माण्ड निरंतर फैलता जा रहा है। और उसका कारण यह मानते थे कि या तो इस ब्रह्माण्ड की Energy Density इतनी पर्याप्त है कि एक समय इसका फैलना बंद हो जायेगा और यह एक बिंदु में समा जायेगा। या फिर इसकी energy density इतनी कम है कि यह हमेशा फैलता ही रहेगा।
Energy Density एनर्जी की वह मात्रा है जिसको हम एक पदार्थ या system में स्टोर कर सके। यानी अगर किसी पदार्थ की energy density ज्यादा है तो इसका मतलब उस पदार्थ में ज्यादा Energy store है।
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अब theory के मुताबित एक बात बिलकुल तय थी। कि Gravity ब्रह्माण्ड के फैलने की speed को बीतते समय के साथ धीमा कर देगा। ऐसा वह इसलिए मानते थे, क्योंकी उन्हें लगता था की यह ब्रह्माण्ड सामान्य रूप से दिखाई देने वाले पदार्थो से बना हुआ है। और इनकी  Gravity सपूर्ण ब्रह्माण्ड को बांधे हुई है। यद्यपि  गुरुत्वाकर्षण ( Gravity ) में खिंचाव होने के कारण ब्रह्माण्ड की गति का धीमा होना स्वाभाविक था मगर 1998  में  Hubble telescope ने एक supernova की तस्वीर खींची थी। जिस से यह पता चला कि हमारे ब्रह्माण्ड के फैलने की गति भूतकाल में आज के मुकाबले धीमी थी। जिसका मतलब यह था की इसकी गति घटने की बजाय और तेज हो रही है। जो उस समय के Space scientists के विपरीत था। सबको मालूम था कि कुछ तो है जिसकी वजह से ऐसा हो रहां है। मगर कोई भी इसको समझा नहीं पा रहा था।
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आखिरकार उन्होंने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए एक Energy की कल्पना की जो ब्रह्माण्ड के खाली स्थानों में मौजूद रहती है। और उनोने इसको नाम दिया Dark Energy ।
डार्क एनर्जी पर वैज्ञानिक विचार | Scientist’s consideration on Dark Energy

डार्क एनर्जी को हम ना तो देख सकते और न ही इसको Test कर सकते हैं मगर इसका प्रभाव हम देख सकते हैं। यह हमारे आस-पास हर जगह मौजूद है पर हम इसको न माप सकते हैं,  और न जांच सकते हैं। ब्रह्माण्ड में जहाँ जहां खली जगह है वहाँ हर पल नयी नयी संरचनाये हो रही हैं। ऐसा लगता है कि जैसे डार्क एनर्जी कुछ इस तरह की उर्जा है ।जो खाली जगह के अंतर्भूत हो सकती है। क्योंकि खाली जगहों के पास संयुक्त ब्रह्माण्ड में मौजूद सभी चीजो की तुलना में अधिक उर्जा है। Dark energy क्या हो सकती है। इस पर वैज्ञानिको के अपने अपने मत हैं।

  • पहला विचार हमारे महान Scientist Albert einstein का है  जिनका मानना यह है। कि खाली स्थान केवल दिखने में खाली होते हैं मगर उनमे कुछ आश्चर्य जनक गुण होते हैं ।
  • उन्होंने यह समझाया था कि ब्रह्माण्ड में खाली स्थान खुद बन सकते हैं तथा इसकी मात्र ब्रह्माण्ड के फैलने के साथ बढ़ सकती है उन्होंने अपनी theory of Gravity में एक cosmological constant  का ज़िक्र किया  था ।और बताया था और बताया था कि  खाली स्थानों की भी अपनी एक energy होती है । जितना ज्यादा खली स्थान बढेगा उतनी  ही यह energy भी बढ़ेगी। जिस से कि यह ब्रह्माण्ड सदा फैलता ही रहेगा मगर उस वक़्त वो यह नहीं समझा पाए की इस  cosmological constant  की  जरुरत क्या है। जिसके कारण उनकी   इस theory को  मान्यता  दी गयी। तो हो सकता है की यह  cosmological constant  ही Dark energy हो ।यह भी पढ़ें –  ब्लैक होल क्या है 
  • दूसरा विचार यह था हो सकता है। यह खाली स्थान वास्तव में अस्थाई (जो स्थिर न हो ) हो और आभासी कणो से  हुआ हो यह कण लगातार स्वतः ही बनते रहते हो। और वापस कही अदृश्य हो जाते हो और इन्ही कणों की energy दरकिनार energy हो सकती है। मगर  physicist  ने यह गणना करने की कोशिश की कि ऐसी energy खाली स्थान को कितनी एनर्जी प्रदान कर सकती है तो     उनका calculation गलत साबित हुआ । क्योंकि यह वास्तव की डार्क एनर्जी से 10120 ज्यादा था। इसलिए Dark Energy का रहस्य अभी भी रहस्य ही बना  है ।
  • अंतिम विचार यह है कि, einstein की theory of Gravity ही गलत है। तथा हमें इसको फिर से समझने के लिए हमें एक ऐसी Theory को समझने की जरुरत है, जो ब्रह्माण्ड के हर गुण को समझा सके मगर ऐसी नयी theory क्या है ? यह हम सोच भी नहीं सकते। आज तक हम Albert einstein की Theory of Gravity के कारण ही ब्रह्माण्ड में मौजूद ब्रह्माण्ड के खगोलीय पिंडो के व्यवहार को न सिर्फ समझते आये हैं, बल्कि उनको सही भी पाया है।  ऐसे में एक बिलकुल नयी theory की कल्पना करना तो मुश्किल है इसलिए हो सकता है कि  cosmological constant  ही डार्क एनर्जी हो , मगर अभी हमारे पास कहने को सिर्फ इतना है कि Dark energy अभी भी एक रहस्य का रहस्य ही बनी हुई है

जानिये हमारा सूर्य कैसे बना और कब तक रहेगा

जानिये हमारा सूर्य कैसे बना और कब तक रहेगा


दोस्तों हमारा सूर्य पृथ्वी पर बसे हर जीव जन्तुओ का जीवन दाता है। हमारे सूर्य के बिना पृत्वी पर किसी भी तरह हमारा जीवन संभव नहीं है यदि सूरज नहीं रहेगा तो धरती पर अँधेरा हो जायेगा और पूरी धरती बर्फ के ढेर में दब जाएगी सूर्य की उर्जा के बिना तो जीवन का अस्तित्व ही असंभव है। लेकिन लगभग साडे 4 अरब सालो से चलता आ रहा यह सिलसिला ऐसे ही चलेगा क्या सूर्य और सूर्यमंडल का अस्तित्व हमेशा के लिए टिका रहेगा क्या सूर्य हमेशा ऐसे ही टिका रहेगा या कभी उसका अंत भी होगा चलिए जानते हैं इन सभी सवालो के जवाब।
                                       सूर्य
सूर्य कैसे बना 
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सूर्य का निर्माण आज से लगभग साड़े चार अरब साल पहले हुआ था। हजारो प्रकाश वर्ष दूर फैला महाकाय molecular cloud के एक बड़े हिस्से के ढह जाने से हमारे सौरमंडल की रचना हो पाई सूर्य और सूर्यमंडल के अस्तित्व को expose करने वाली इस theory का नाम है nebular  theory इस थ्योरी के अनुसार उस विशाल गैस के बादल में एक या उस से अधिक सुपरनोवा जरूर हुए होंगे जिसके कारण उस बड़े गैस के बादल के एक हिस्से के ढह जाने या बिखर जाने से उसका रॉ मटेरियल उस से अलग अलग हो गया। धीरे धीरे उस गैस के बादल का कुछ हिस्सा गति और दबाव की वजह से घूमना शुरू हुआ और गर्म धीरे धीरे गर्म होने लगा रफ़्तार और घुमाव की वजह से उसका एक बड़ा हिस्सा मध्य केंद्र में घटित हुआ और बाकि का हिस्सा उसे चारो और घूमता रहा इसी प्रक्रिया में करोडो  साल लग गए और कई समय बीत जाने से धीरे धीरे तापमान ठंडा हुआ और hydrogen और helium का बीच वाला भाग हमारे सूर्य के रूप में अस्तित्व में आया ।और उसके आस पास घुमने वाले  रॉ मटेरियल से हमारी पृथ्वी गृह उपग्रह क्षुद्र पिंड और अन्य पिंड अस्तित्व  में आये। और इस तरह से हमारे सौरमंडल का जन्म हुआ सूर्य हमारे सौर मंडल का सबसे  बड़ा पिंड है । दरअसल सूर्य धरती और अन्य ग्रहों से अलग है वास्तव में सूर्य एक तारा है हमारी आकाशगंगा के सौ अरब से अधिक तारो में से एक तारा।
यह भी जाने higgs boson, god particle क्या है 
हमारा  सूर्य G2 केटेगरी का तारा है जो आकाश गंगा के 10 फ़ीसदी में से एक है। जैसे हमारी पृथ्वी और अन्य गृह सूर्य की परिक्रमा करते है ठीक वैसे ही हमारा सूर्य हमारे सम्पूर्ण  सौरमंडल को लेकर आकाशगंगा की परिक्रमा करता है । हमारे सौर्य मंडल के सभी ग्रहों को हमारी आकाशगंगा की परिक्रमा करने में लगभग 25 करोड़ साल लग जाते हैं सौर्य मंडल में सबसे ज्यादा द्रव्यमान (भार) हमारे सूर्य का है जिसका व्यास 13 92 000 km है सूर्य हमें देखने में  भले ही इतना बड़ा न  लगता हो लेकिन असल में सूरज पृथ्वी से लगभग 10 लाख गुना बड़ा है ।क्योंकि वह  धरती से लगभग 149600000 मतलब लगभग 15 करोड़ km  दूर है इतने दूर से   सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी पर पहुँचने में सिर्फ 8.16 minute लग जाते हैं ।
ब्रह्माण्ड के अजब गजब रहस्य 
सूरज मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम से बना हुआ एक गोला है सूरज की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हीलियम, सल्फर, लोहा, ऑक्सीजन, मग्नीसियम, सिलिकॉन कार्बन क्रोमियम, तत्वों से मिलकर बना है ।सूर्य के अंदर के केंद्र ताप को कोर(core) कहा जाता है जिसका चरम तापमान 1560000 डिग्री सेल्सियस तक होता है ।
सूर्य का अंत कैसे होगा 
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4.5 अरब साल पहले जन्मा हमारा सूर्य हर सेकंड लगभग 65700000 लाख टन हाइड्रोजन को 65300000 लाख टन के लिए हमें ट्रान्सफर करता है। 400000 टन हाइड्रोजन का हीलियम में रूपान्तर होता ही नहीं बल्कि हीलियम की बजाय उर्जा में रूपांतरित होता है और वह उर्जा अंतरिक्ष में चारो और फ़ैल जाती है। ऐसे सूर्य हर सेकंड अपना पदार्थ गुमा रहा है लेकिन ऐसा कब तक चलेगा तो इस प्रश्न का जवाब यह है की यह प्रक्रिया लगभग 5 अरब साल तक चलेगा उसके बाद सूर्य के केंद्र का हाइड्रोजन समाप्त हो जायेगा। जिसके कारण सूर्य के केंद्र का तापमान अपनी हद पार कर देगा और वह धीरे धीरे उसका अकार बढ़ने लगेगा ।और और सूर्य अपने मूल अवस्था से 100 गुना ज्यादा बड़ा हो जायेगा जब कोई ऐसे विकसित होता है तब उसको red giant कहते हैं हमारा सूरज भी एक दिन ऐसे ही Red giant हो जायेगा ।
ब्लैक होल क्या है यहं पढ़े 
सूर्य के अकार के इतने बढ़ने के कारण उसका व्यास इतना बढ़ जायेगा कि बुध और शुक्र गृह को तो वह पहले ही निगल चूका होगा ।और तब आयेगी हमारी पृथ्वी की बारी लेकिन तब तक पृथ्वी पर सूरज की गर्मी की कारण सभी जीव जन्तो का नाश हो चुका होगा और करोडो साल पश्चात सूर्य में अब हाइड्रोजन के बदले हीलियम ही बचा होगा। और वह हीलियम अब कार्बन में रूपांतरित होना शुरू होगा और फिर भी बढ़ता रहेगा धीरे धीरे उसके बहार की परत छाल की तरह  उखड़कर अंतरिक्ष में बिखर जाएगी और अंत में एक गुठली जैसा आतंरिक भाग बचेगा ।वह भाग लगभग आज की पृथ्वी के जितना होगा लेकिन इसकी गर्मी बहुत ज्यादा होगी। और इस तरह हमारे सूर्य को एक श्वेत वामन तारा या जिसको हम इंग्लिश में white dwarf  कहते हैं का रूप मिलेगा ।
धीरे धीरे वो वामन सूर्य भी अपनी उर्जा को खो देगा और अंत में बुझ कर एक काले कोयले के सामान हो जायेगा इस तरह साड़ी सृष्टि का अंत करके हमारे सूर्य का भी अंत हो जायेगा ।लेकिन इस प्रक्रिया में 5 अरब साल लग जयेगे ब्रह्माण्ड में कई तारे red giant का रूप ले चुके हैं कई white dwarf का रूप ले चुके है। और कई तारो का अंत हो चुका है । लेकिन समय समय पर हारे ब्रह्माण्ड में नए नए तारो का भी जन्म हो रहा है ऐसे ही हमारे ब्रह्माण्ड में जन्म और अंत की यह प्रक्रिया अविरत रूप से चलती ही रहेगी 

Kepler-90 पृथ्वी जैसे 8 ग्रह वाला सौरमंडल मिला

Kepler-90 पृथ्वी जैसे 8 ग्रह वाला सौरमंडल मिला




Kepler-19 –
हमारे Universe में अनगिनत Planet मौजूद हैं जिनकी खोज निरंतर जारी है आये दिन वैज्ञानिको को नए नए Planet मिल रहे हैं।  जिस से ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी सभ्यता या फिर कहे की Aliens की होने की Possibility बढती जा रही है।   अमेरिका की Space agency NASA  के Kepler Telescope और Hubble telescope  के कारण ब्रह्माण्ड के कई रहस्यों का राज धीरे धीरे खुल रहा  है।  कुछ दिनों पहले Kepler telescope ने एक ऐसे Solar system की खोज की है जहाँ हमारे जैसे Solar system की तरह ही 8 Planets एक तारे Kepler-90 का चक्कर लगा रहे हैं।  ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि वहां भी हमारी धरती की तरह कोई न कोई ग्रह जरुर होगा जहाँ जीवन मौजूद हो सकता है।

NASA ने हमारे सौर मण्डलके जैसे ही एक दूसरा सौरमण्डल खोज निकला है जिसमे हमारे सौरमंडल की तरह ही 8 ग्रह मौजूद हैं अब तक की research में इसको सबसे बड़ी सफलता माना जा रहा है । अमेरिका की Space agency NASA के Kepler Telescope ने इसकी खोज की । है  Kepler Space Telescope साल 2009 में launch किया गया था और तब से लेकर अब तक इसने डेढ़ लाख तारो को scan किया है।  astronomer ने केपलर डाटा के जरिये अब तक 2500 Planets की खोज की है।  आपकी जानकारी के लिए बता दें की यह Solar system तो पहले ही खोजा जा चुका था मगर अब इसके आठवें ग्रह की भी पुष्टि कर ली गयी है।  इस Solar system को Kepler-90 नाम दिया गया है और इसके आठवें ग्रह का नाम Kepler-90i  है जो की Kepler-90 Solar system का सबसे छोटा ग्रह है।  इस सौरमण्डल के आठ ग्रहों का नाम है।

Kepler-90b
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Kepler-90 पृथ्वी जैसे 8 ग्रह वाला सौरमंडल मिला



NASA द्वारा खोजा गया यह Solar system हमसे 2545 Light Years दूर है।  बताया जाता है कि Kepler-90i  जो कि इस सौर मंडल का सबसे छोटा Planet है हमारी पृथ्वी की तुलना में करीब 30% बड़ा है।  लेकिन यह हमारी पृथ्वी की तरह बिलकुल भी नहीं है बल्कि आप इसको नरक से भी बदतर जगह कह सकते हैं।  क्योंकि यह ग्रह इतना सुखा और गर्म है की आप इस पर कभी भी जाना नहीं चाहेंगे।  इस खोज में google artificial intelligence की मदद ली गयी जो इंसानों के योग्य रहने वाले Planets की तलाश में Help करता है ।  Google और NASA के इस सम्मिलित Project द्वारा  हमारे जैसे ही सौरमंडल की खोज से इस बात की उम्मीद बढ़ गयी है कि ब्रह्माण्ड के किसी न किसी कोने में दूसरी सभ्यता तो जरुर विकसित होगी, और कभी न कभी देर सबेर उनसे हमारी मुलाकात होना तय है।


Kepler-90i Planet का तापमान करीब 426 Degree Celsius तक हो सकता है जो की बुद्ध ग्रह के बराबर है और बुद्ध( Mercury ) ग्रह हमारे सौरमण्डल में सूर्य के सबसे नजदीकी और गर्म ग्रह है ।  Kepler-90i अपने Orbit में 14.4 दिन में एक चक्कर पूरा कर लेता है।  यानी हम यह कह सकते है की Kepler-90i पर पृथ्वी का 1 साल सिर्फ 2 हफ़्तों का ही होगा।  NASA ने बताया है कि इन आठ ग्रहों वाले इस  नए solar system में Kepler-90 नाम के तारे के चारो तरफ ये आठ ग्रह चक्कर लगा रहे हैं और इस solar system में भी छोटे ग्रह तारे के पास है और बड़े ग्रह उस से दूर।  अब देखने वाली बात यह है कि इस  Solar system Kepler-90 में हमारी पृथ्वी जैसा ग्रह मिलता है या नहीं जहां जीवन मौजूद हो और इंसान भविष्य में वहां अपनी बस्तियां बसा सके।

चंद्रयान 2 को फेल मिशन नहीं कहा जा सकता

चंद्रयान 2 को फेल मिशन नहीं कहा जा सकता

भारत के मिशन चंद्रयान 2 में आखिरी वक्त पर गड़बड़ी आ गई. ISRO के कंट्रोल रूम से लैंडर का संपर्क टूट गया. लेकिन इसके बावजूद इस मिशन को फेल नहीं कहा जा सकता…
22 जुलाई 2019 को इसरो ने 3,840 किलोग्राम वजनी चंद्रयान 2 को सतीश धवन स्पेस सेण्टर श्री हरिकोटा से सफलता पूर्वक Launch किया गया था। 20 अगस्त को चंद्रयान 2 चंद्रमा की कक्षा में सफकतापूर्वक दाखिल होने में भी कामयाब रहा था। यहाँ तक तो सारी मशीन एक साथ गयी लेकिन इसके बाद ऑर्बिटर और लैंडर दोनों को अलग अलग हो जाना था, ऑर्बिटर मतलब जिसने चाँद के चारो तरफ चक्कर लगाने थे, और विक्रम लैंडर वो जिसमे चन्द्रमा की सतह पर लैंड करना था। और २ सितंबर 2019 को ऑर्बिटर से लैंडर को successfully अलग भी कर दिया गया था। यहाँ तक तो यह मिशन लगभग 80% कामयाब हो चूका था क्योंकि इस मिशन का जो सबसे बड़ा और सबसे कीमती पार्ट था वो था ऑर्बिटर जो कि चाँद की कक्षा में दाखिल करवाया गया है और अभी भी वह चाँद के चक्कर लगा रहा है। अब ऑर्बिटर को तो चाँद की कक्षा में Successfully दाखिल करवा दिया गया था जो कि अभी भी सही से काम कर रहां है और 1 साल तक ऐसे ही लगातार काम करता रहेगा। तो थोड़ी देर के लिए अब हम ऑर्बिटर को भूल जाते है। अब बात करते हैं विक्रम लैंडर की कि उसका क्या हुआ।
तो जब लैंडर ऑर्बिटर से अलग हुआ तो वह धीरे धीरे चन्द्रमा की सहत की ओर नीचे आने लगा और प्लान के मुताबिक पर चल रहा था , लैंडर विक्रम (Lander vikram) के चांद की सतह पर पहुंचने से पहले के 15 मिनट बहुत ज्यादा important थे। क्योंकि इन्ही 15 मिनट में लैंडर की velocity भी कम करनी थी, लैंडर को 90 डिग्री भी घुमाना था, और लैंडर को चाँद की सतह को scan भी करना था, जहाँ पर वह safly land कर पाए। और वो 15 मिनट्स अब शुरू हो चुके थे। लैंडिंग के दौरान कुछ साँसे रोक देने वाले पल
शुक्रवार रात 1 बजकर 38 : विक्रम के उतरने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।1बजकर 44 : सतह से 28 किमी दूर था
1बजकर 46 : 19 किमी दूर
1बजकर 49 : 12 किमी दूर रह गया
1बजकर 50 : 2.5 किमी दूर रह गया
1बजकर 52 : 2.1 किमी दूरी पर सूचनाएं मिलना बंद
1बजकर 54 : धरती से कनेक्शन की पुष्टि का इंतजार
1बजकर 55 : विक्रम लैंडिंग साइट की पुष्टि में व्यस्त
1बजकर 56 : इसरो प्रमुख ने पीएम मोदी को दी जानकारी
2बजकर 11 : इसरो ने कहा आंकड़ों का इंतजार। इसके बाद ही किसी निष्कर्ष में पहुंचे
2बजकर 17 : इसरो प्रमुख सिवन ने की संपर्क टूटने की औपचारिक घोषणा

लैंडर विक्रम शुक्रवार की रात को चांद की सतह से महज 2.1 किलोमीटर की दूरी पर आकर वह अपना रास्ता भटक गया और उससे ISRO का संपर्क टूट गया। भारत के करोड़ों देशवासियों की सांसें 15 मिनट के दौरान जैसे सी रुक गई थीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद इस ऐतिहासिक पल को देखने के लिए ISRO के मुख्यालय में मौजूद थे। इसरो के वैज्ञानिकों ने मिशन मून में लैंडिंग की जिस तरह से तैयारी की थी, उस तरह से हो नहीं पाई लेकिन इसके बावजूद मिशन को फेल नहीं कहा जा सकता।  इसरो के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत फ्लॉप नहीं हुई है. और ऐसा कहने के पीछे एक नहीं कई सारी वजहें हैं.
चंद्रयान 2 भले ही चांद से महज चंद किलोमीटर दूर कही गुम जरूर हो गया है। लेकिन, अब भी इस मिशन को लेकर उम्मीदें कायम है। यह मिशन करीब-करीब कामयाब रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रयान 2 से संपर्क टूटने के बाद भी यह मिशन 95 % तक सफल रहा है। क्योंकि 2,379 किलो वजनी ऑर्बिटर चाँद की सतह से 119 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रहा है जिसमे 8 पॉवरफुल डिवाइसेस लगाए गए हैं।

चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर १ साल तक काम करेगा –

जिसने चांद का डिजिटल मॉडल तैयार करने के लिए टेरेन मैपिंग कैमरा-2 है।
चांद की सतह पर मौजूद तत्वों की जांच के लिए इसमें चंद्रयान 2 लार्ज एरिया सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर है।
क्लास को सोलर एक्स-रे स्पेक्ट्रम इनपुट मुहैया कराने के लिए सोलर एक्स-रे मॉनीटर है।
चांद पर पानी की मौजूदगी का पता लगाने और वहां मौजूद मिनरल्स पर शोध के लिए इसमें इमेजिंग आईआर स्पेक्ट्रोमीटर है।
चांद के ध्रुवों की मैपिंग करने और सतह के नीचे जमी बर्फ का पता लगाने के लिए इसमें डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार है।
चांद की ऊपरी सतह पर शोध के लिए इसमें चंद्र एटमॉसफेयरिक कंपोजिशन एक्सप्लोरर-2 है।
ऑर्बिटर हाई रेजॉल्यूशन कैमरा के जरिये यह हाई रेस्टोपोग्राफी मैपिंग की जाएगी।
चांद के वातावरण की निचली परत की जांच करने के लिए डुअल फ्रीक्वेंसी रेडियो उपकरण है।

चंद्रयान 2 को कामयाब इसलिए भी मानना होगा क्योंकि बहुत ही कम खर्च में इस मिशन को अंजाम दिया गया. चंद्रयान 2 में सिर्फ 140 मिलियन डॉलर यानी करीब 1000 करोड़ का खर्च आया. अमेरिका ने अपने अपोलो मिशन में 100 बिलियन डॉलर खर्च किए थे.
चीन ने अपने चांग इ 4 नमक अंतरिक्ष यान को चाँद पर पहुँचाने के लिए 1200 करोड़ रुपये खर्च किये थे।
वही पिछले महीने इसराइल ने भी अपने लैंडर को चाँद पर लैंड करवाने के लिए एक बेरशीट मिशन किया था, लेकिन उसका बेरशीट चाँद से 10 की ऊंचाई पर ही क्रैश हो गया था। और कण्ट्रोल रूम से संपर्क टूट गया था।
और भारत ने अपने एक ही मिशन में लैंडर, रोवर, और ऑर्बिटर रखे हुए थे उसके बाद भी कुल खर्चा 970 करोड़ रुपये आया। इसरो की यही खासियत उनको बाकि देशो से अलग बबनाती है। क्योंकि जितने खर्च में बाकि देश केवल 1 मिशन करते हैं उस से भी कम खर्चे में इसरो अपने 3 मिशन एक साथ करने की क्षमता रखता है।

नासा भी चाँद पर पहुँचने से पहले 12 बार फेल हुआ था और तब जाकर 13 वी बार में वो चाँद पर पहुँच पाया था।
अगर बात करे रूस की तो रूस को चाँद पर पहुंचे से पहले 5 बार फेल हुआ था उसके बाद छटवां और सातवा मिशन उसका सक्सेफुल हुआ उसके बाद फिर से रूस लगातार 11 बार फेल हुआ। तब जाकर रूस को यह कामयाबी मिली।
और इसरो का तो यह पहला एटेम्पट था जिसमे भी वह 99.9 % सफल ही रहा, और ऑर्बिटर लगातार १ साल तक धरती पर चाँद का डाटा भेजता रहेगा। और मुझे 100 % भरोसा है कि भारत अपने अगले मिशन चंद्रयान 3 में चाँद की सतह पर जरूर पहुँचेगा और कामयाबी हासिल करेगा।
हमको अपने इसरो के वैज्ञानिको पर इसलिए भी गर्व होना चाइये दोस्तों क्योंकि इन्होने लॉन्चर, ऑर्बिटर, रोवर, लैंडर, सब कुछ खुद ही बनाया था। कोई भी पार्ट दूसरे देश से नहीं खरीदा था। हालाँकि पहले लैंडर के लिए रूस से बात हुई थी लेकिन बाद में रूस लैंडर बनाने से मुकर गया था फिर इसरो ने खुद से ही लैंडर बनाने की सोची और बना भी दिया।
दोस्तों इसे इतने का बजट में भी इसरो अंतरिक्ष में इतनी बड़ी बड़ी छलांग लगाता है, जिसके लिए हमको उनपर गर्व होना चाहिए। आज इसरो किसी भी अन्य देश पर निर्भर नहीं है वो जो चाहे बनान सकता है और जैसा मिशन चाहे कर सकता है। अभी इसरो के कुछ upcoming missions हैं

ISRO’s upcomming missions –
Aditya-L1 (2020)
Gaganyaan mission (2022 )
Mangalyaan-2 (2022-2023)
Chandrayan-3 mission (2024)
Shukrayaan mission (2023-2025)
India’s Space Station (2023)

चंद्रमा के 10 ऐसे खुलासे जो आपको रोमांचित कर देंगे

चंद्रमा के 10 ऐसे खुलासे जो आपको रोमांचित कर देंगे


 सौरमंडल का 5वां सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा पृथ्‍वी के सबसे नजदीक है। पृथ्वी से लगभग 3,84,365 किलोमीटर दूर चंद्रमा का धरातल असमतल है और इसका व्यास 3,476 किलोमीटर है तथा द्रव्यमान, पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 1/8 है। पृथ्वी के समान इसका परिक्रमण पथ भी दीर्घ वृत्ताकार है। सूर्य से परावर्तित इसके प्रकाश को धरती पर आने में 1.3 सेकंड लगता है।

1. चंद्र ग्रह नहीं, उपग्रह है : ग्रह और उपग्रह में फर्क होता है। चंद्रमा धरती का एक उपग्रह है। इसी तरह शनि, बृहस्पति और प्लूटो आदि ग्रहों के भी उपग्रह अर्थात चांद है। वैज्ञानिकों के अनुसार चांद से भी बड़े उपग्रह सौर जगत में मौजूद हैं जिनमें से सबसे बड़ा बृहस्पति ग्रह के पास कलिस्टो स्थित है। इसके अलावा शनि का टाइटन और ईओ भी चंद्रमा से बड़े हैं। चंद्र को जीवाश्म ग्रह भी कहा जाता है।

2. कैसे बना चंद्रमा : चंद्रमा लगभग 4.5 करोड़ वर्ष पूर्व धरती और थीया ग्रह (मंगल के आकार का एक ग्रह) के बीच हुई भीषण टक्कर से जो मलबा पैदा हुआ, उसके अवशेषों से बना था। यह मलबा पहले तो धरती की कक्षा में घूमता रहा और फिर धीरे-धीरे एक जगह इकट्टा होकर चांद की शक्ल में बदल गया। अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाए गए पत्‍थरों की जांच से पता चला है कि चंद्रमा और धरती की उम्र में कोई फर्क नहीं है। इसकी चट्टानों में टाइटेनियम की मात्रा अत्यधिक पाई गई है।

3. क्या है चंद्रमा पर : चंद्रमा की खुरदुरी सहत पर बेहद अस्‍थिर और हल्का वायुमंडल होने की संभावना व्यक्त की जाती है और यहां पानी भी ठोस रूप में मौजूद होने के सबूत मिले हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार यह वायुमंडलविहीन उपग्रह है। नासा के एलएडीईई प्रोजेक्ट के मुताबिक यह हीलियम, नीयोन और ऑर्गन गैसों से बना हुआ है। चंद्रमा का सबसे बड़ा पर्वत दक्षिणी ध्रुव पर स्थित लीबनिट्ज पर्वत है, जो 35,000 फुट (10,668 मी.) ऊंचा है।

4. कैसा है चंद्रमा का वातावरण : यहां का वातावरण एकदम शांत है लेकिन यहां तापमान में भारी मात्रा में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। चंद्रमा की सतह पर धूल का गुबार सूर्योदय और सूर्योस्त के समय मंडराता रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका एक कारण अणुओं का इलेक्ट्रिकली चार्ज होना हो सकता है। ऐसा सूर्य वाली दिशा में ही होता है। यहां की धूल चिपचिपी है जिसके चलते वैज्ञानिकों के उपकरण खराब हो जाते हैं। यदि कोई अंतरिक्ष यात्री वहां जाएगा तो उसके कपड़ों पर धूल जल्दी से चिपक जाएगी और फिर उसे निकालना मुश्किल होता है।

दूसरी ओर चंद्रमा के पिछले भाग की धूल के मैदान को शांतिसागर कहते हैं, जो अंधकारमय है। चन्द्रमा, पृथ्वी की 1 परिक्रमा लगभग 27 दिन और 8 घंटे में पूरी करता है और इतने ही समय में अपने अक्ष पर एक घूर्णन करता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई पड़ता है।


5. गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम है : चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति धरती से कम है इसलिए वहां पर मनुष्य का वजन लगभग 16.5 प्रतिशत कम हो जाता है। यदि कारण है कि व्यक्ति वहां आसानी से उछलकूद कर सकता है। चंद्रमा पर 1.62 m/s² गुरुत्वाकर्षण है। हालांकि गुरुत्वाकर्षण हर जगह अलग-अलग होता है। चंद्रमा में गुरुत्वाकर्षण बल है तभी तो वह धरती के समुद्र में ज्वारभाटा उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।

6. एक दिन हमेशा के लिए छुप जाएगा चांद : वैज्ञानिक ऐसी संभावना व्यक्त करते हैं कि चंद्रमा हर वर्ष धरती से 3.78 सेंटीमीटर दूर होता जा रहा है। एक निश्चित दूरी होने पर पर चंद्रमा धरती की परिक्रमा करने में 28 दिन की बजाए 47 दिन लगाएगा। यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है कि यदि चांद इसी तरह से ज्यादा दूर होता जाएगा तो धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति और कक्षा से दूर होकर अंतरिक्ष में कहीं खो सकता है। ऐसे में धरती पर दिन महज 6 घंटे के लिए रह जाएगा। मतलब बाकी समय रात रहेगी?

7. काला आसमान : धरती पर से हमें आसमान नीला और सफेद जैसा दिखाई देता है तो उसका कारण है कि धरती पर 70 प्रतिशत से ज्यादा जल है, जो रिफ्लेक्ट होता है। इतनी अधिक मात्रा में जल होने के कारण धरती का वायुमंडल भी साफ और स्वच्‍छ है। लेकिन चांद पर ऐसा नहीं है। वहां धूल उड़ती रहती है और पानी ठोस रूप में कहीं-कहीं पर ही है। ऐसे में वहां अधिकतर समय आसमान काला ही दिखाई देता है।

8. चंद्रमा से धरती को निहारना : पूर्णिमा के दिन हमें चांद बड़ा और सुंदर दिखाई देता है। इसमें एकदम चमकदार सफेद रंग होता है। मतलब चमकीला चांद। धरती से चन्द्रमा का 57% भाग ही देखा जा सकता है। लेकिन चांद पर जब खड़े होकर आप धरती को देखेंगे तो वह पूर्णिमा के चांद से लगभग 45 गुना ज्यादा चमकीला और नीला दिखाई देगा और यह भी कि यह अपने मौलिक आकार से 4 गुना बड़ा भी दिखाई देगा। मतलब यह कि चांद से धरती को देखेंगे तो अब तक चांद पर जितने भी गीत, कविता और गाने लिखे गए हैं वे सभी धरती के सामने फीके पड़ जाएंगे।

9. विपरीत होता है ग्रहण : धरती पर जो सूर्य और चंद्रग्रहण हम देखते हैं, यदि वह चांद से देखेंगे तो विपरीत दिखाई देंगे। मतलब यह कि पृथ्वी पर अगर चंद्र ग्रहण लगा है तो चांद पर सूर्य ग्रहण होगा। ऐेसे में यदि पृथ्वी पर सूर्य ग्रहण है तो चांद पर चंद्र ग्रहण की धरती ग्रहण होगा?


10. चांद के पत्थर धरती पर : चांद से लाए गए 3 छोटे-छोटे पत्थरों की पिछले साल अमेरिका के न्यूयॉर्क में नीलामी हुई। नीलामी में ये पत्‍थर 8 लाख 50 हजार डॉलर (करीब 6 करोड़ रुपए) में बिके। इन्हें 1970 में चांद पर भेजे गए रूसी लूना-16 मिशन के दौरान हासिल किया गया था। शुरुआत में ये तत्कालीन सोवियत संघ के अंतरिक्ष कार्यक्रम के दिवंगत निदेशक सर्गेई पावलोविक कोरोलेव की पत्नी के पास थे। इन्हें पहली बार 1993 में नीलाम किया गया था। कहते हैं कि नील आर्मस्ट्रांग भी चांद से पत्‍थर लाए थे।

हुमायूँ का मकबरा घूमने की जानकारी – Humayun’s Tomb Information In Hindi

हुमायूँ का मकबरा घूमने की जानकारी / Humayun’s Tomb Information 


हुमायूँ का मकबरा ताजमहल के 60 वर्षों से पहले निर्मित मुगल सम्राट हुमायूं का अंतिम विश्राम स्थल है जो दिल्ली के निज़ामुद्दीन पूर्व क्षेत्र में स्थित है और भारतीय उपमहाद्वीप में पहला उद्यान मकबरा है। हुमायूँ का मकबरा दिल्ली का एक प्रमुख ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल है, जो भारी संख्या में इतिहास प्रेमियों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। हुमायूँ का मकबरा अपने मृत पति के लिए पत्नी के प्यार को प्रदर्शित करता है। फ़ारसी और मुग़ल स्थापत्य तत्वों को शामिल करते हुए इस उद्यान मकबरे का निर्माण 16 वीं शताब्दी के मध्य में मुगल सम्राट हुमायूँ की स्मृति में उनकी पहली पत्नी हाजी बेगम द्वारा बनाया गया था। हुमायूँ के मकबरे की सबसे खास बात यह है कि यह उस समय की उन संरचनाओं में से एक है जिसमें इतने बड़े पैमाने पर लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया था।

अपने शानदार डिजाइन और शानदार इतिहास के कारण हुमायूँ का मकबरा को साल 1993 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया था। हुमायूँ के मकबरे की वास्तुकला इतनी ज्यादा आकर्षित है कि कोई भी इसे देखे बिना नहीं रह पाता। यह शानदार मकबरा एक बड़े अलंकृत मुगल गार्डन के बीच में स्थित है और इसकी सुंदरटा सर्दियों के मौसम में काफी बढ़ जाती है। हुमायूँ का मकबरा यमुना नदी के तट पर स्थित है और यह अन्य मुगलों के अवशेषों का भी घर है, जिनमें उनकी पत्नियाँ, पुत्र और बाद के सम्राट शाहजहाँ के वंशज, साथ ही कई अन्य मुगल भी शामिल हैं।


1. हुमायूँ का मकबरा हिस्ट्री – History Of Humayun’s Tomb



20 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसके शरीर को शुरू में दिल्ली के पुराण किला में दफनाया गया था। सम्राट की मृत्यु के कारण उनके मुख्य संरक्षक बेगा बेगम को बहुत पीड़ा हुई थी जिन्होंने साम्राज्य के सभी में सबसे अधिक शक्तिशाली मकबरे बनाने की कसम खाई। मक्बरे का निर्माण हुमायूँ की मृत्यु के नौ साल बाद 1565 में शुरू हुआ था और और 1572 ई में पूरा हुआ। इस मकबरे का निर्माण उस समय 1.5 मिलियन रुपये की लागत से पूरा हुआ था जो अकेले महारानी द्वारा वहन किया गया था। भारत के विभाजन के दौरान हुमायूँ का मकबरा पुराण किले के साथ-साथ मुसलमानों के पाकिस्तान में पलायन के समय एक आश्रय के रूप में कार्य करता था। हुमायूँ के मकबरे का गौरव तब बढ़ा जब इसे 1993 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

2. हुमायूँ के मकबरे की वास्तुकला – Architecture Of Humayun’s Tomb 

हुमायूँ के मकबरे की संरचना इस्लामिक और फ़ारसी वास्तुकला का मिश्रण है जो मकबरे लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर में एक बढ़िया नमूना है। आपको बता दें कि यह मकबरा फारसी डबल गुंबद को शामिल करने वाली पहली भारतीय संरचना भी है, जो 42.5 मीटर ऊंची है, जहां बाहरी संरचना संगमरमर के बाहरी हिस्से का समर्थन करती है और आंतरिक काव्यात्मक अंदरूनी भाग में ले जाती है। दक्षिण प्रवेश द्वार के माध्यम से संरचना में प्रवेश करने पर आप भारी जाली और पत्थर की जाली के काम को देख सकते हैं। यहाँ पर सफेद गुंबद के नीचे मुगल बादशाह हुमायूँ का शव दफन है।

3. चार बाग गार्डन हुमायूँ का मकबरा – Char Bagh Garden Humayun’s Tomb 

चार-बाग एक फारसी शैली का बगीचा है, जिसमें ज्यामितीय लेआउट है और इसे 4 स्कुएर पैदल मार्गों में विभाजित किया गया है, इसलिए इसे चार बाग नाम दिया गया है। इस गार्डन में चार वर्गों को छोटे मार्गों में विभाजित किया गया है, जिससे 36 वर्ग बनते हैं। यह गार्डन एक जल निकाय द्वारा दो भागों में विभाजित है। इस गार्डन के तीन तरफ पत्थर के टुकड़े यानी मलबे की दीवार है और चौथी तरफ यमुना नहीं बहती है।

क्षुद्रग्रह के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Asteroid

क्षुद्रग्रह के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Asteroid



  • क्षुद्रग्रह छोटे सौर मंडल निकाय हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। चट्टान और धातु से बने, इनमें कार्बनिक यौगिक भी हो सकते हैं।



  •  क्षुद्रग्रह आकार में बहुत भिन्न होते हैं, कुछ का व्यास दस मीटर से छोटा होता है जबकि कुछ का सौ किलोमीटर से अधिक व्यास हो सकता है।



  •  पहली बार क्षुद्रग्रह की खोज 1801 में इटली के खगोलशास्त्री ग्यूसेप पियाज़ी ने की थी। नामांकित सेरेस नाम के इस क्षुद्रग्रह का व्यास लगभग 950 किलोमीटर है और अब इसे बौना ग्रह माना जाता है।



  • क्षुद्रग्रह बेल्ट सौर मंडल में मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच स्थित है।



  • कई वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं द्वारा माना जाता है कि लगभग 65 मिलियन साल पहले डायनासोर के विलुप्त होने के पीछे एक क्षुद्रग्रह का पृथ्वी पे गिरना है।




क्षुद्रग्रह        अंतरिक्ष यात्री        मंगल

अंतरिक्ष        यूरेनस        बुध

प्लूटो        नेपच्यून        शनि

शुक्र        बौने ग्रह        याक

धूमकेतु        पृथ्वी        चीता

ब्लैक होल        सूर्य        नेवला



  •  वर्तमान में हमारे सौर मंडल में 600,000 से अधिक ज्ञात क्षुद्रग्रह हैं।



  •  खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल ने पहली बार क्षुद्रग्रह शब्द को गढ़ा, जिसका अर्थ 1802 में "स्टार की तरह" था।



  •  माना जाता है कि चौड़ाई में लगभग 0.15 किलोमीटर क्षुद्रग्रह का साइबेरिया के ऊपर विस्फोट हुआ है, जिससे सैकड़ों किलोमीटर के दायरे में नुकसान हुआ है।



  •  अधिकांश क्षुद्रग्रह आकार में अनियमित हैं क्योंकि वे आकार में गोलाकार बनने के लिए पर्याप्त गुरुत्वाकर्षण खिंचाव को कम करने के लिए बहुत छोटे हैं।


एक कार के आकार का उल्कापिंड (क्षुद्रग्रह का टुकड़ा) हर साल औसतन एक बार पृथ्वी के वायुमंडल में गिरता है।

अंतरिक्ष यात्री के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Astronaut

अंतरिक्ष यात्री के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Astronaut 



 एक अंतरिक्ष यात्री या कॉस्मोनॉट एक अंतरिक्ष यान का नेतृत्व करने के लिए एक अंतरिक्ष यान कार्यक्रम के द्वारा प्रशिक्षित एक व्यक्ति है, जो अंतरिक्ष यान पर अंतरिक्ष में जाने के लिए एक अभियान दल का सदस्य है।



  • 2. वर्ल्ड एयर स्पोर्ट्स फेडरेशन (FAI) केवल उन्हीं उड़ानों को मान्यता देता है जो अंतरिक्ष उड़ानों के रूप में 100 किमी से अधिक की ऊंचाई तक पहुंचती हैं। हालांकि, यूएसए किसी भी अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष यात्री के रूप में सम्मानित करता है जो 80 किमी से ऊपर की यात्रा करते हैं।



  • 3. स्पेसवॉक करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को आमतौर पर अंतरिक्ष यान पर आवश्यक कार्यों या सुधारों को पूरा करने के लिए 70 से 110 उपकरणों का उपयोग करना पड़ता है।



  • 4. रूसी संघीय अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा नियुक्त एक अंतरिक्ष यात्री को कोसोमावेट (अंग्रेजी में कॉस्मोनॉट) कहा जाता हैं।



  • 5. अंतरिक्ष में पहुंचने वाला पहला व्यक्ति सोवियत, यूरी गगारिन था, 1961 में, अंतरिक्ष यान वोस्टॉक 1 पर सवार होकर, उसने 108 मिनट तक पृथ्वी की परिक्रमा की थी।





क्षुद्रग्रह        अंतरिक्ष यात्री        मंगल

अंतरिक्ष        यूरेनस        बुध

प्लूटो        नेपच्यून        शनि

शुक्र        बौने ग्रह        याक

धूमकेतु        पृथ्वी        चीता

ब्लैक होल        सूर्य        नेवला



  • 6. अंतरिक्ष की पहली महिला 1963 में सोवियत वैलेंटाइना टेरेश्कोवा थी। उसने वोस्टॉक 6 पर सवार होकर लगभग 3 दिनों तक पृथ्वी की परिक्रमा की।



  • 7. रूसी, सर्गेई क्रिकेलव, दो ISS अभियानों सहित 6 बार अंतरिक्ष में गए हैं और अंतरिक्ष में कुल 803 दिन, 9 घंटे और 39 मिनट (या 2.2 वर्ष) बिताए हैं।



  • 8. नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन सहित, 12 लोग चंद्रमा पर चले हैं, छह अलग-अलग अपोलो मिशनों में से प्रत्येक से दो लोग।



  • 9. कॉस्मोनॉट एलेक्सी लियोनोव 18 मार्च 1965 को वोसखोड़ 2 मिशन पर "स्पेसवॉक" करने वाले पहले व्यक्ति थे।



  • 10. सबसे दूर के अंतरिक्ष यात्री ने पृथ्वी से 401,056 किमी की दूरी पर यात्रा की, जिम लवेल, जैक स्विर्ट और फ्रेड हाइस अपोलो 13 अंतरिक्ष यान पर सवार थे।

अंतरिक्ष के बारे में रोचक तथ्य , Interesting Facts About Space

अंतरिक्ष के बारे में रोचक तथ्य | Interesting Facts About Space 

  • सूर्य पृथ्वी से 300000 गुना बड़ा है।
  • चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा छोड़े गए पैरों के निशान और टायर की पटरियां हमेशा के लिए वहां रह जाएंगी क्योंकि उन्हें उड़ाने के लिए कोई हवा नहीं है।
  • 3. सौर मंडल का गठन लगभग 4.6 बिलियन साल पहले हुआ था।
  • शनि एकमात्र रिंग वाले ग्रह नहीं है, बृहस्पति, यूरेनस और नेप्च्यून जैसे अन्य गैस वाले ग्रहों में भी रिंग होते है, वे सिर्फ कम स्पष्ट ढिकाई देते हैं।
  • शुक्र ग्रह हमारे सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है जिसकी सतह का तापमान 450 डिग्री सेल्सीयस से अधिक है।



क्षुद्रग्रह        अंतरिक्ष यात्री        मंगल

अंतरिक्ष        यूरेनस        बुध

प्लूटो        नेपच्यून        शनि

शुक्र        बौने ग्रह        याक

धूमकेतु        पृथ्वी        चीता

ब्लैक होल        सूर्य        नेवला

  • 2006 में, खगोलविदों ने एक ग्रह की परिभाषा बदल दी। इसका मतलब यह है कि प्लूटो को अब एक बौना ग्रह के रूप में जाना जाता है।
  •  कम गुरुत्वाकर्षण की वजह से, पृथ्वी पर 90 kg वजन वाले एक व्यक्ति का वजन मंगल की सतह पर केवल 34 kg होगा।
  •  पहला मानव निर्मित वस्तु 1957 में अंतरिक्ष में भेजा गया था जब स्पुतनिक नामक रूसी उपग्रह लॉन्च किया गया था।
  •  मनुष्य को ज्ञात सबसे ऊँचा पर्वत वेस्टा नामक क्षुद्रग्रह पर है। इसकी ऊँचाई 22 किलोमीटर है, यह माउंट एवरेस्ट से तीन गुना ऊँचा है।
  • मंगल ग्रह पर सूर्यास्त नीला दिखाई देता है।

International Space Station क्या है और यह कैसे काम करता है ?


International Space Station क्या है और यह कैसे काम करता है ?


International Space Station –

International Space Station को हम हिन्दी में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन भी कहते है। आज तक के इतिहास में यह अंतरिक्ष में  बनाया जाने वाला सबसे बड़ा मानव निर्मित उपग्रह है। जिसको नाम दिया गया International Space Station । इसको पांच देशो ने मिलकर बनाया है जिनमे  Canada, Japan, Russia, United States, European Space Agency शामिल है। 27,600 km/h की स्पीड से धरती का चक्कर काटते हुए यह उपग्रह, नई तकनीक, खगोलीय, पर्यावरण और भूगर्भीय शोध के लिए एक प्रयोगशाला है, जो धरती से 400 km उपर स्थित है। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को छोटेछोटे टुकड़ों में अंतरिक्ष में ले जा कर इसके कक्ष (Orbit) में स्थापित किया गया। 20 नवम्बर1998 को सबसे पहले रूस काRussian-built Zarya module लांच किया गया और इसकोorbit में सही से स्थापति किया गया उसके बाद 2 नवम्बर 2000 तक इसको इंसानों के लिए रहने लायक बनाया गया और उसके बाद से लेकर आज तक कोई भी ऐसा दिन नहीं  रहा जबInternational Space Station पर कोई व्यक्ति(astronaut) रहा हो। और साल2011 में यह स्टेशन लगभग पूरा हो गया जैसा की आज दिखता है ।आज भीastronaut बारी  बारी  से  वहाँ आते जाते रहते हैं और experiment करते रहते हैं और इसमें नए नए उपकरण  जोड़ते हैं। और जहाँ पर यह  टूटता है वहां पर इसकी मरम्मत भी करते है, ताकि यह लम्बे समय तक सही सलामत चलता रहे। इसका आकार 109 meters by 73 meters यानी एकFootball Ground के जितना है। यहाँ astronaut के  रहने, खाने पीने, सोने, Toilet, bathroom, laboratory, का सारा इन्तेजाम है जहां एक बार में 6 astronauts आराम से रह सकते हैं। तो अब  आप यह जान ही चुके है कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन क्या है। तो अब यह जानते हैं कि International Space Station कैसे काम करता है।


International Space Station कैसे काम करता है ?
तो यह बात तो आप जान चुके हैं कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन अपने आप में एक बहुत बड़ा spacecraft है।

जहाँ पर astronauts औरcosmonauts रहते हैं और वहां Lab में तरह तरह का अध्ययन करते रहते हैं। ताकि technology को और विकसित किया जा सकेInternational Space Station धरती से 400 km की दूरी पर स्थित है। और 27,600 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से धरती का चक्कर लगाता है। यानी यह स्टेशन 90 minute में धरती का एक चक्कर पूरा कर लेता है
जैसे की मैंने आपको उपर बताया की इसमें 6 astronauts एक बार में आराम से रह सकते हैं लेकिन किसी emergency में यहाँ और लोग भी रह सकते हैं। अभी तक यहाँ सबसे ज्यादा 13 लोग एक साथ रह चुके हैं। जो भीastronauts यहाँ काम करते हैं उनके लिए यहाँ Gym भी होता है जहाँ  exercise के लिए बहुत सेinstruments  होते हैं क्योंकि ISS (International Space Station) धरती से 400 km दूर है जहाँgravity के बराबर है, और इतनी कमgravity में धरती पर रहने वाले किसी भी जीव की हड्डियाँ कमजोर होने लगती हैं। इसलिए वहां astronauts वहांexercise करते हैं ताकि वापस धरती पर आकर उन्हें कोई तकलीफ हो। यहाँtemperature को control करने के लिए एक radiator भी लगा होता है जो वहां के तापमान को धरती के जैसा ही बनाये रखता है ताकि वहां रह रहे scientist को कोई दिक्कत हो

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 8 solar array wings लगे हुए हैं जो सूर्य की रौशनी से ही 84 से 120 kilowatts की  बिजली Generate कर सकते हैं 

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के बाहर कुछrobotics arms भी लगे होते हैं। वह इसलिए क्योंकि जब भी धरती से कोई नया part station पर जोड़ने के लिए भेजा जाता है तो यहrobotics arms उसको पकड़ लेते हैं और फिर astronauts उसparts को International Space Station की सही जगह पर जोड़ देते हैं। और इसी तरह जब धरती से अंतरिक्ष यात्री उस station पर जाते हैं तो वह अपने shuttle को स्टेशन के पास ले जाते हैं। और फिर स्टेशन कीrobotic arms उनके shuttle को पकड़ कर docking station पर जोड़ देता है। और और इस तरह वे लोग ISS में प्रवेश कर जाते हैं और पहले से रह रहे astronauts उनसे मिलते हैं बात चीत करते हैं और फिर पुराना astronauts का दस्ता उसshuttle से वापस धरती पर जाते हैं। और नया दस्ता अपने काम में लग जाता है। और यहाँ आने जाने की यह प्रक्रिया महीने दो महीने में लगी रहती है
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर बहुत सारेexperiment किये जाते हैं जो यहाँ धरती पर नहीं हो पाते हैं। देखा जाता है कि वहां इंसान की Body पर क्या effect पड़ता है। और भी बहुत से टेस्ट किये जाते हैं जो हम भी नहीं जानते इसके अलावा इस स्टेशन से हम धरती के मौसम को, धरती पर होने वाले बदलाव को भी देख सकते हैं।